भयानक बाढ़ और ग्लेशियर फटने से हुई तबाही के बाद नेपाल ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से 'क्लाइमेट जस्टिस' की मांग की है, साथ ही $20 मिलियन के मुआवजे का दावा किया है।

  • नेपाल ने बाढ़ के नुकसान की भरपाई के लिए UN के 'लॉस एंड डैमेज फंड' से $20 मिलियन की मांग की है।
  • 26 अगस्त को ग्लेशियर फटने से 1,300 से अधिक लोगों की मौत और 5,000 लापता।
  • वैश्विक उत्सर्जन में नेपाल का योगदान 0.1% से भी कम है, फिर भी वह सबसे अधिक प्रभावित है।
  • हिमालयी ग्लेशियर पिछले दशक की तुलना में 65% तेजी से पिघल रहे हैं।

नेपाल ने हाल ही में आई विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन के बाद वैश्विक मंच पर "क्लाइमेट जस्टिस" (जलवायु न्याय) की पुरजोर मांग की है। रासुवा और नुवाकोट क्षेत्रों सहित चीन के तिब्बत क्षेत्र में आई इस आपदा ने हजारों लोगों की जान ले ली है, जिसके बाद नेपाल सरकार ने $20 मिलियन के मुआवजे का दावा किया है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, यह आपदा जलवायु परिवर्तन का सीधा परिणाम थी। 26 अगस्त को एक पहाड़ी ग्लेशियर के ढहने से पानी और कीचड़ का ऐसा सैलाब आया जिसने पूरे इलाके को तबाह कर दिया। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 1,300 से अधिक लोगों की मृत्यु हो चुकी है और 5,000 से अधिक लोग अब भी लापता हैं।

नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने स्पष्ट किया कि इस सहायता को "दान" या "खैरात" के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा, "हम उस वैश्विक संकट की कीमत चुका रहे हैं जिसे हमने पैदा नहीं किया है। इसे जलवायु न्याय के दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए।" राष्ट्रपति रामचन्द्र पौडेल ने भी राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में अंतरराष्ट्रीय समुदाय से पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील देशों की आवाज सुनने की अपील की।

यह क्यों महत्वपूर्ण है?

BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि नेपाल की स्थिति "क्लाइमेट गैप" का एक ज्वलंत उदाहरण है। नेपाल दुनिया के दो सबसे बड़े कार्बन उत्सर्जकों—भारत और चीन—के बीच स्थित है, लेकिन वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में इसका योगदान 0.1 प्रतिशत से भी कम है। यह विडंबना है कि जो देश पर्यावरण को सबसे कम नुकसान पहुँचा रहे हैं, वे ही सबसे भीषण तबाही झेल रहे हैं।

"जलवायु न्याय एक नैतिक सिद्धांत है जो जलवायु परिवर्तन के असमान प्रभाव को दूर करने और कमजोर समुदायों की सुरक्षा करने की वकालत करता है।"

डेटा के अनुसार, हिंदूकुश हिमालय पर्वत श्रृंखला में 2011 से 2020 के बीच बर्फ पिघलने की दर पिछले दशक की तुलना में 65 प्रतिशत अधिक रही है। संयुक्त राष्ट्र की 2023 की रिपोर्ट बताती है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण नेपाल ने पिछले तीन दशकों में अपने ग्लेशियरों के बर्फ आयतन का लगभग एक-तिहाई हिस्सा खो दिया है।

स्थानीय कार्यकर्ता श्रेया केसी और तनुजा पांडे का कहना है कि दुनिया तभी ध्यान देती है जब मरने वालों की संख्या हजारों में पहुँच जाती है। उनका तर्क है कि केवल हेडलाइंस बनने से जलवायु परिवर्तन से लड़ने की तात्कालिकता पैदा नहीं होती, बल्कि इसके लिए ठोस वित्तीय और नीतिगत बदलाव की जरूरत है।

पैमानानेपाल की स्थितिवैश्विक संदर्भ
GHG उत्सर्जन< 0.1%G20 देशों द्वारा संचालित
बर्फ की हानि (2011-20)अत्यधिक तीव्रपिछले दशक से 65% अधिक
अनुमानित नुकसान$2.56 बिलियनUN फंड गैप: $2.8 बिलियन
क्या आप जानते हैं?: हिंदूकुश हिमालय श्रृंखला को "एशिया का वाटर टावर" कहा जाता है क्योंकि यह करोड़ों लोगों के लिए मीठे पानी का मुख्य स्रोत है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'लॉस एंड डैमेज फंड' क्या है?
यह संयुक्त राष्ट्र द्वारा बनाया गया एक कोष है जिसका उद्देश्य उन देशों को वित्तीय सहायता देना है जो जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले नुकसान से सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं।

नेपाल मुआवजे की मांग क्यों कर रहा है?
क्योंकि नेपाल का कार्बन उत्सर्जन नगण्य है, लेकिन विकसित देशों द्वारा फैलाए गए प्रदूषण के कारण उसे ग्लेशियर पिघलने और बाढ़ जैसी आपदाओं का सामना करना पड़ रहा है।