पूर्व राजनयिक अजय बिसारिया ने चेतावनी दी है कि डोनाल्ड ट्रंप की अस्थिर प्रकृति के कारण अमेरिका ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को पश्चिम विरोधी मान सकता है, जबकि भारत इसे 'गैर-पश्चिमी' मंच के रूप में पेश कर रहा है।

  • पूर्व राजनयिक अजय बिसारिया ने ट्रंप प्रशासन द्वारा ब्रिक्स की गलत व्याख्या करने की आशंका जताई है।
  • भारत ब्रिक्स को 'पश्चिम विरोधी' (Anti-West) के बजाय 'गैर-पश्चिमी' (Non-West) समूह के रूप में ब्रांड कर रहा है।
  • रूस और चीन समूह को भू-राजनीतिक मोड़ देने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि भारत आर्थिक विकास पर केंद्रित रहना चाहता है।
  • समूह के विस्तार (सऊदी अरब, ईरान, यूएई) से किसी एक राजनीतिक सहमति पर पहुँचना और कठिन हो गया है।

नई दिल्ली में आयोजित होने वाले 18वें ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन से पहले वैश्विक राजनीति में हलचल तेज हो गई है। पूर्व राजनयिक अजय बिसारिया ने इंडिया टुडे राउंडटेबल में चर्चा करते हुए आगाह किया कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की 'अस्थिर' प्रकृति के कारण अमेरिका इस सम्मेलन को पश्चिम विरोधी मान सकता है। बिसारिया के अनुसार, व्हाइट हाउस का वर्तमान माहौल और चीन-रूस की सक्रिय भागीदारी इस गलतफहमी को जन्म दे सकती है।

बिसारिया ने स्पष्ट किया कि भारत इस मुद्दे पर रक्षात्मक रुख नहीं अपनाएगा। उन्होंने कहा कि भारत अपनी 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) के मुद्दे पर मजबूती से खड़ा रहेगा और ब्रिक्स का बचाव करेगा। भारत ने जानबूझकर ब्रिक्स की ब्रांडिंग को बदला है ताकि इसे एक ऐसे मंच के रूप में देखा जाए जो पश्चिम के खिलाफ नहीं, बल्कि पश्चिम से अलग (Non-Western) है और जिसका मुख्य उद्देश्य आर्थिक व विकासात्मक मुद्दे हैं।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि भारत एक अत्यंत कठिन संतुलन बना रहा है। एक तरफ वह अमेरिका के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को मजबूत करना चाहता है, वहीं दूसरी ओर वह ग्लोबल साउथ (Global South) की आवाज के रूप में ब्रिक्स में अपनी भूमिका को सुरक्षित रखना चाहता है। यदि ट्रंप प्रशासन इसे 'एंटी-अमेरिकन' राजनीति के रूप में देखता है, तो यह भारत के द्विपक्षीय व्यापार और राजनयिक संबंधों के लिए चुनौती पैदा कर सकता है।

"भारत ब्रिक्स को पश्चिम विरोधी दिशा में धकेलने के किसी भी प्रयास का विरोध करता रहा है क्योंकि यह भारत के राष्ट्रीय हितों के अनुकूल नहीं है।"

भू-राजनीतिक विश्लेषक अशोक मलिक ने इस चर्चा में जोड़ा कि ब्रिक्स के भीतर हमेशा से दो विजन रहे हैं। एक विजन इसे केवल आर्थिक मंच मानता है, जबकि दूसरा इसे एक शक्तिशाली भू-राजनीतिक पहचान देना चाहता है। रूस और चीन अक्सर इसे दूसरे विजन की ओर ले जाने की कोशिश करते रहे हैं, लेकिन भारत ने हमेशा आर्थिक सहयोग और विकास को प्राथमिकता दी है।

मलिक के अनुसार, ब्रिक्स के विस्तार ने अब किसी एक साझा राजनीतिक स्थिति पर पहुँचना लगभग असंभव बना दिया है। जब समूह में सऊदी अरब, यूएई और ईरान जैसे देश शामिल हों, तो यूक्रेन या ईरान जैसे विवादित मुद्दों पर सर्वसम्मति बनाना एक बड़ी चुनौती बन जाता है। अब समूह को जलवायु परिवर्तन, आपूर्ति श्रृंखला और आर्थिक लचीलेपन जैसे साझा क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करना होगा।

दृष्टिकोण रूस और चीन का विजन भारत का विजन
प्रकृति भू-राजनीतिक और पश्चिम-विरोधी आर्थिक और गैर-पश्चिमी
मुख्य लक्ष्य वैश्विक शक्ति संतुलन बदलना विकास और समावेशी वृद्धि
रणनीति अमेरिका को चुनौती देना रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना
क्या आप जानते हैं?: डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले साल ब्रिक्स देशों को 'एंटी-अमेरिकन' राजनीति करने का आरोप लगाया था और चेतावनी दी थी कि जो देश डॉलर का विकल्प खोजेंगे, उन पर 10% टैरिफ लगाया जा सकता है।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: भारत ब्रिक्स को 'गैर-पश्चिमी' क्यों कहना चाहता है?
उत्तर: ताकि वह अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ अपने संबंधों को खराब किए बिना विकासशील देशों के हितों का प्रतिनिधित्व कर सके।

प्रश्न 2: ब्रिक्स के विस्तार का भारत पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर: विस्तार से समूह में विविधता बढ़ी है, जिससे राजनीतिक सहमति बनाना कठिन होगा, लेकिन आर्थिक सहयोग के नए अवसर खुलेंगे।