भारत में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बीच दुनिया की नजरें इस बात पर हैं कि क्या यह समूह पश्चिमी संस्थानों का विकल्प बन पाएगा। ईरान-अमेरिका संघर्ष के बीच सदस्य देशों के बीच मतभेद एक बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं।

  • भारत नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है, जबकि ईरान और अमेरिका के बीच तनाव चरम पर है।
  • ब्रिक्स का विस्तार अब ईरान, यूएई, सऊदी अरब, मिस्र, इथियोपिया और इंडोनेशिया तक हो चुका है।
  • विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रिक्स की सफलता पश्चिम को पूरी तरह बदलने में नहीं, बल्कि उसके प्रभुत्व को कठिन बनाने में है।
  • अंतरराष्ट्रीय व्यापार में स्वायत्तता और आर्थिक सहयोग इस समूह को जोड़ने वाले मुख्य कारक हैं।

वैश्विक राजनीतिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया है क्योंकि भारत नई दिल्ली में ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है। यह बैठक ऐसे समय में हो रही है जब ईरान, जो 2024 से ब्रिक्स का सदस्य है, अमेरिका और इजरायल के हमलों का सामना कर रहा है। यह शिखर सम्मेलन केवल एक राजनयिक औपचारिकता नहीं है, बल्कि एक ऐसी दुनिया में आम सहमति खोजने का प्रयास है जहाँ सदस्य देश, जैसे कि तेहरान और अबू धाबी, क्षेत्रीय संघर्षों में अक्सर विपरीत पक्षों पर खड़े नजर आते हैं।

ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के गठबंधन के रूप में शुरू हुआ ब्रिक्स अब एक व्यापक गठबंधन में बदल चुका है। यूएई, सऊदी अरब, मिस्र, इथियोपिया और इंडोनेशिया के शामिल होने के बाद, यह समूह अब दुनिया की जनसंख्या और आर्थिक उत्पादन के एक बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। हालांकि, जैसे-जैसे यह गठबंधन अपनी 20वीं वर्षगांठ के करीब पहुंच रहा है, एक मौलिक प्रश्न बना हुआ है: क्या इतनी विविध राजनीतिक विचारधाराओं वाला समूह वास्तव में स्थापित पश्चिमी व्यवस्था को चुनौती दे सकता है?

यह क्यों महत्वपूर्ण है?

BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि ब्रिक्स की वास्तविक शक्ति G7 की नकल करने में नहीं, बल्कि पश्चिमी प्रभाव के 'स्पॉइलर' के रूप में कार्य करने में है। व्यापार और निवेश के वैकल्पिक रास्ते प्रदान करके—जैसे चीन की बिना शर्त विकास सहायता और ब्राजील की मुद्रा विनिमय पहल—ब्रिक्स ने उस प्रभाव को कम किया है जो IMF और विश्व बैंक जैसे पश्चिमी संस्थानों का विकासशील देशों पर रहा है।

ब्रिक्स का ऐतिहासिक संदर्भ 2008 के वित्तीय संकट और WTO के दोहा राउंड की विफलता से जुड़ा है। इन घटनाओं ने वैश्विक शासन में एक प्रणालीगत पूर्वाग्रह को उजागर किया, जिससे उभरती अर्थव्यवस्थाओं को संगठित होने की प्रेरणा मिली। इसका लक्ष्य वैश्विक शासन की भारी जिम्मेदारियों को उठाना नहीं था, बल्कि यह सुनिश्चित करना था कि 'ग्लोबल साउथ' अब पश्चिमी नीतियों का केवल एक निष्क्रिय प्राप्तकर्ता न रहे।

"ब्रिक्स की सफलता इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि वह पश्चिमी संस्थानों का विकल्प बन सकता है या नहीं, बल्कि इस बात से कि वह पश्चिमी प्रभुत्व को लागू करना कितना कठिन बनाता है।"

अपनी आर्थिक ताकत के बावजूद, इस समूह के सामने बड़ी बाधाएं हैं। अमेरिकी डॉलर का प्रभुत्व अभी भी कायम है, और भारत-चीन के बीच सीमा विवाद सामूहिक सुरक्षा कार्रवाई में बाधा डालते हैं। इसके अलावा, 'पश्चिम' की परिभाषा खुद बदल रही है, जिससे यह स्पष्ट नहीं है कि यह समूह वास्तव में किसे चुनौती दे रहा है—अमेरिका को या यूरोप को।

विशेषता पश्चिमी व्यवस्था (G7/IMF) ब्रिक्स दृष्टिकोण
शर्तें अक्सर लोकतांत्रिक सुधारों/मानवाधिकारों से जुड़ी बिना राजनीतिक शर्तों के विकास पर ध्यान
शासन केंद्रीकृत, स्थापित पदानुक्रम बहुध्रुवीय, आम सहमति आधारित (धीमी प्रक्रिया)
मुख्य लक्ष्य वैश्विक स्थिरता/यथास्थिति बनाए रखना ग्लोबल साउथ की सौदेबाजी की शक्ति बढ़ाना
क्या आप जानते हैं?: ब्रिक्स मूल रूप से कोई आधिकारिक संगठन नहीं था, बल्कि 2001 में गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्रियों द्वारा तेजी से बढ़ती उभरती अर्थव्यवस्थाओं का वर्णन करने के लिए गढ़ा गया एक शब्द था।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: क्या ब्रिक्स अमेरिकी डॉलर की पूरी तरह से जगह ले सकता है?
हालांकि 'डी-डॉलरइजेशन' और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार की चर्चा है, लेकिन अधिकांश विश्लेषकों का मानना है कि डॉलर का प्रभुत्व बना रहेगा क्योंकि अमेरिकी ट्रेजरी मार्केट में गहरा भरोसा है।

प्रश्न 2: नई दिल्ली शिखर सम्मेलन विशेष रूप से महत्वपूर्ण क्यों है?
यह एक लिटमस टेस्ट है कि क्या यह समूह अपने सदस्यों (ईरान) और उनके रणनीतिक साझेदारों (अमेरिका/इजरायल) के बीच हिंसक भू-राजनीतिक संघर्षों के बावजूद एकता बनाए रख सकता है।