ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच बढ़ते तनाव ने ब्रिक्स (BRICS) की आंतरिक एकता को खतरे में डाल दिया है। यह संघर्ष दर्शाता है कि विविध रणनीतिक हितों वाले देशों के बीच सर्वसम्मति बनाना कितना कठिन है।

  • ईरान और यूएई के बीच का संघर्ष ब्रिक्स के विस्तार के बाद सबसे बड़ा भू-राजनीतिक परीक्षण बन गया है।
  • अमेरिकी-इजरायली सैन्य अभियान और उसके जवाब में ईरान की कार्रवाई ने सदस्य देशों के बीच गहरे मतभेद पैदा किए हैं।
  • नई दिल्ली शिखर सम्मेलन में 'दिल्ली घोषणा' को लेकर आम सहमति बनाना भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती है।

वर्ष 2026 में, ब्रिक्स (BRICS) जिसे ग्लोबल साउथ को एक मजबूत आवाज देने के लिए विस्तारित किया गया था, अब एक कठिन वास्तविकता का सामना कर रहा है। ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बीच का टकराव केवल दो देशों का विवाद नहीं रह गया है, बल्कि इसने इस संगठन की निर्णय लेने की क्षमता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जब दो पूर्ण सदस्य देश एक सक्रिय संघर्ष के विपरीत पक्षों पर हों, तो सर्वसम्मति आधारित मॉडल की सीमाएं स्पष्ट हो जाती हैं।

यह प्रतिद्वंद्विता पुरानी है, लेकिन हालिया घटनाओं ने इसे विस्फोटक बना दिया है। फरवरी 2026 के अंत में ईरान के खिलाफ अमेरिकी-इजरायली सैन्य अभियान के बाद, ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों और यूएई स्थित साइटों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए। इसके जवाब में, अबू धाबी ने अगस्त में तेहरान के साथ व्यापारिक और वित्तीय लेनदेन निलंबित कर दिए और अपना दूतावास बंद कर लिया। हॉर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान ने इसे एक वैश्विक ऊर्जा और आर्थिक सुरक्षा संकट में बदल दिया है।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि ब्रिक्स का विस्तार उसकी प्रतिनिधित्व क्षमता तो बढ़ा सकता है, लेकिन यह उसकी सामूहिक राजनीतिक कार्रवाई की क्षमता को कम कर रहा है। जब सदस्य देशों के राष्ट्रीय हित सीधे तौर पर टकराते हैं, तो संगठन का 'सर्वसम्मति मॉडल' एक बाधा बन जाता है। यह स्थिति दर्शाती है कि ब्रिक्स अब एक एकजुट गठबंधन के बजाय अलग-अलग रणनीतिक प्राथमिकताओं का एक समूह बनता जा रहा है।

"ब्रिक्स की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जितना अधिक यह राजनीतिक रूप से विविध होगा, उतनी ही मुश्किल होगी इसकी घोषणाओं को कूटनीतिक महत्व देना।"

नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत को यह सुनिश्चित करना है कि ईरान-यूएई विवाद संगठन को पंगु न बना दे। तेहरान जहां अमेरिकी-इजरायली कार्रवाई की निंदा चाहता है, वहीं अबू धाबी समुद्री सुरक्षा और अपने क्षेत्र पर हमलों की निंदा पर जोर दे रहा है। रूस और भारत जैसे देश मध्यस्थता की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन जब विवादित पक्ष स्वयं सदस्य हों, तो समाधान कठिन हो जाता है।

यह स्थिति केवल खाड़ी तक सीमित नहीं है। पहले भी भारत-चीन तनाव और मिस्र-इथियोपिया के बीच नील नदी विवाद ने यह साबित किया है कि सदस्य देश अपनी आपसी दुश्मनी को संगठन के दरवाजे के बाहर नहीं छोड़ सकते। 2026 का संकट इसलिए अलग है क्योंकि इसमें आर्थिक परिणाम वैश्विक स्तर पर महसूस किए जा रहे हैं।

क्या आप जानते हैं?: हॉर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग है, जहाँ से वैश्विक कच्चे तेल का लगभग 20% से अधिक हिस्सा गुजरता है।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: ब्रिक्स में ईरान और यूएई के बीच मुख्य विवाद क्या है?
उत्तर: यह विवाद मुख्य रूप से खाड़ी द्वीपों के स्वामित्व, क्षेत्रीय संरेखण और हालिया सैन्य हमलों के कारण उत्पन्न हुआ है।

प्रश्न 2: भारत की इस स्थिति में क्या भूमिका है?
उत्तर: भारत वर्तमान अध्यक्ष के रूप में दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाने और एक साझा 'दिल्ली घोषणा' तैयार करने का प्रयास कर रहा है।