नई दिल्ली में संपन्न हुआ ब्रिक्स शिखर सम्मेलन आर्थिक सहयोग के वादों के बावजूद ईरान युद्ध जैसे गंभीर भू-राजनीतिक मुद्दों पर एक साझा रुख अपनाने में विफल रहा। यह घटनाक्रम समूह की बढ़ती शक्ति और उसकी आंतरिक विविधताओं के बीच के संघर्ष को दर्शाता है।
- ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ईरान युद्ध पर कोई स्पष्ट संयुक्त घोषणा करने में विफल रहा।
- समूह के विस्तार ने क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता (जैसे ईरान और यूएई) को संगठन के भीतर ला दिया है।
- भारत जैसे देश ब्रिक्स को रणनीतिक स्वायत्तता के साधन के रूप में देखते हैं, न कि अमेरिका विरोधी गठबंधन के रूप में।
- ब्रिक्स एक भू-राजनीतिक ब्लॉक के बजाय एक शक्तिशाली सौदेबाजी के गठबंधन (Bargaining Coalition) के रूप में अधिक प्रभावी है।
नई दिल्ली में आयोजित हालिया ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन आर्थिक संबंधों को गहरा करने और सहयोग बढ़ाने के पारंपरिक वादों के साथ समाप्त हुआ। हालांकि, इस सम्मेलन में एक महत्वपूर्ण बात जो खलल बनी, वह थी ईरान पर चल रहे अमेरिकी-इजरायली युद्ध पर समूह की चुप्पी। यद्यपि इस संघर्ष ने ब्रिक्स के अधिकांश सदस्यों और भागीदार देशों को प्रभावित किया है, लेकिन समूह द्वारा जारी घोषणापत्र में इस मुद्दे पर कोई सीधा उल्लेख या अमेरिका की भूमिका पर कोई निंदा नहीं की गई।
विस्तार की कीमत: आंतरिक संघर्ष
ब्रिक्स का विस्तार करना इसकी वैश्विक पहुंच को तो बढ़ाता है, लेकिन इसने क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता को भी संगठन के भीतर समाहित कर लिया है। ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण हैं। दोनों ही ब्रिक्स का हिस्सा हैं, लेकिन मध्य पूर्व में उनकी रणनीतिक गणनाएं एक-दूसरे के विपरीत हैं। मई में नई दिल्ली में हुई विदेश मंत्रियों की बैठक में भी इस बात का संकेत मिल चुका था कि समूह ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई पर एक साझा रुख अपनाने में असमर्थ है।
क्यों यह महत्वपूर्ण है?
BozokMedia विश्लेषण दिखाता है कि ब्रिक्स की सबसे बड़ी ताकत ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई है। समूह की विविधता इसे वैश्विक दक्षिण (Global South) के लिए वैधता तो प्रदान करती है, लेकिन यही विविधता किसी भी ठोस भू-राजनीतिक कार्रवाई को असंभव बना देती है। जब तक सदस्य देशों के राष्ट्रीय हित आपस में टकराते रहेंगे, ब्रिक्स एक एकीकृत सैन्य या राजनीतिक शक्ति बनने के बजाय केवल एक आर्थिक मंच बना रहेगा।
ब्रिक्स का भविष्य एक भू-राजनीतिक शक्ति बनने में नहीं, बल्कि एक आर्थिक सौदेबाजी के गठबंधन के रूप में विकसित होने में निहित है।
भारत की भूमिका यहाँ सबसे महत्वपूर्ण है। नई दिल्ली ब्रिक्स को अपनी 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) बनाए रखने के एक उपकरण के रूप में देखता है। भारत एक तरफ रूस और चीन के साथ जुड़ा हुआ है, तो दूसरी तरफ अमेरिका और क्वाड (Quad) के साथ अपने रक्षा संबंधों को भी मजबूत कर रहा है। भारत के लिए ब्रिक्स को अमेरिका विरोधी गुट में बदलना उसकी विदेश नीति के मूल सिद्धांतों के खिलाफ होगा।
इसी तरह, चीन और रूस भी सीधे टकराव से बचना चाहते हैं। रूस पश्चिमी आर्थिक दबाव को कम करना चाहता है, लेकिन वह अमेरिका और नाटो के साथ सीधे सैन्य संघर्ष से भी बचना चाहता है। चीन एक बहुध्रुवीय विश्व चाहता है, लेकिन वह अमेरिका के साथ अपने विशाल व्यापारिक संबंधों को भी पूरी तरह खत्म नहीं कर सकता।
बहुध्रुवीयता का जाल (The Polycentric Trap)
ब्रिक्स एक ऐसे चक्रव्यूह में फंसा है जहाँ प्रत्येक नया सदस्य आर्थिक संसाधन तो लाता है, लेकिन साथ ही नए जटिल राष्ट्रीय हित भी लाता है। यह समूह अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में सुधार, दक्षिण-दक्षिण व्यापार और स्थानीय मुद्रा में भुगतान जैसे मुद्दों पर तो सहमत हो सकता है, लेकिन वास्तविक युद्ध की स्थिति में 'पक्ष चुनने' के मामले में यह बिखर जाता है।
Frequently Asked Questions
1. क्या ब्रिक्स एक सैन्य गठबंधन है?
नहीं, ब्रिक्स मुख्य रूप से एक आर्थिक और राजनीतिक सहयोग मंच है, न कि कोई सैन्य गठबंधन।
2. ईरान युद्ध ने ब्रिक्स को कैसे प्रभावित किया?
इस युद्ध ने दिखाया कि ब्रिक्स के सदस्य देशों के हित आपस में टकराते हैं, जिससे वे एक साझा भू-राजनीतिक रुख अपनाने में विफल रहे।