1.5C तापमान सीमा का उल्लंघन होने की संभावना के बीच, संयुक्त राष्ट्र समर्थित एक नई रणनीति 'अस्थायी वृद्धि' और फिर 'तेजी से गिरावट' का सुझाव देती है। विशेषज्ञों का कहना है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति तकनीकी प्रगति से बहुत पीछे है।

  • 2015 के पेरिस समझौते द्वारा निर्धारित 1.5C तापमान सीमा को अब बनाए रखना लगभग असंभव माना जा रहा है।
  • UNEP ने 'ओवरशूट, पीक और डिक्लाइन' (वृद्धि, शिखर और गिरावट) का मार्ग सुझाया है।
  • 2010 के बाद सौर ऊर्जा की लागत में 90% की कमी आई है, फिर भी जीवाश्म ईंधन का उपयोग रिकॉर्ड स्तर पर है।
  • AI डेटा सेंटर एक नया खतरा बनकर उभरे हैं, जिनकी बिजली खपत 2030 तक दोगुनी होने का अनुमान है।

2015 में 200 देशों द्वारा पेरिस समझौते पर हस्ताक्षर करना वैश्विक एकता का एक दुर्लभ क्षण था। उस समय दुनिया ने संकल्प लिया था कि औद्योगिक स्तर से पूर्व के तापमान में वृद्धि को 1.5C (2.7F) तक सीमित रखा जाएगा। लेकिन 11 साल बाद, यह स्पष्ट हो गया है कि जीवाश्म ईंधन के निरंतर उपयोग के कारण पृथ्वी जल्द ही इस सीमा को पार कर लेगी।

नैरोबी, केन्या स्थित संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की 'लिमिटिंग ओवरशूट' रिपोर्ट के अनुसार, सबसे आशावादी परिदृश्य में भी पृथ्वी का तापमान 1.8C तक बढ़ जाएगा। रिपोर्ट में एक नया दृष्टिकोण पेश किया गया है: "ओवरशूट, पीक और डिक्लाइन"। इसका अर्थ है कि तापमान 1.5C की सीमा को पार करेगा, एक शिखर तक पहुंचेगा और फिर धीरे-धीरे सदी के अंत तक वापस नीचे आएगा।

यह क्यों महत्वपूर्ण है?

BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि 'ओवरशूट' रणनीति कोई विकल्प नहीं, बल्कि एक आपातकालीन उपाय है। 1.5C से ऊपर का हर एक अंश विनाशकारी होगा। नेपाल में हाल ही में आई विनाशकारी बाढ़, जिसमें 1,300 से अधिक लोगों की जान गई, इसका जीता-जागता उदाहरण है। यदि तापमान बहुत अधिक बढ़ गया, तो हम 'टिपिंग पॉइंट्स' (Tipping Points) तक पहुँच सकते हैं, जहाँ से प्रकृति को वापस सामान्य करना असंभव होगा।

"ओवरशूटिंग बेहद खतरनाक है और अनियंत्रित टिपिंग पॉइंट्स के जोखिम को बढ़ाती है; यदि यह होना ही है, तो हमारा काम इसे यथासंभव छोटा और संक्षिप्त रखना है।"

विडंबना यह है कि हमारी तकनीकी प्रगति राजनीतिक प्रगति से कहीं आगे निकल गई है। अंतर्राष्ट्रीय अक्षय ऊर्जा एजेंसी (IRENA) के अनुसार, 2010 की तुलना में सौर ऊर्जा अब 90% सस्ती हो गई है। 2025 में, 90% से अधिक नए बिजली प्रोजेक्ट जीवाश्म ईंधन संयंत्रों की तुलना में सस्ते थे। इसके बावजूद, वैश्विक CO2 उत्सर्जन 2025 में 38.4 बिलियन टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया।

संयुक्त राज्य अमेरिका की अस्थिर जलवायु नीतियों ने इस गति को धीमा किया है। डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में पेरिस समझौते से हटने और तेल निर्यात को बढ़ावा देने से वैश्विक नेतृत्व में कमी आई है। विशेषज्ञों का कहना है कि अब हमें तकनीक की नहीं, बल्कि उन सरकारों की जरूरत है जिनमें जीवाश्म ईंधन को पूरी तरह समाप्त करने का साहस हो।

इसके साथ ही, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की बढ़ती मांग ने चुनौती को और बढ़ा दिया है। 2024 में AI डेटा केंद्रों ने वैश्विक बिजली का 1.5% उपभोग किया, जिसके 2030 तक दोगुना होने की संभावना है। अब Apple और Meta जैसी टेक कंपनियों पर यह जिम्मेदारी है कि वे अपने उत्सर्जन को कम करने के लिए नए तरीके खोजें।

क्या आप जानते हैं?: सौर ऊर्जा की लागत इतनी गिर चुकी है कि यह अब दुनिया भर में नई बिजली उत्पादन के लिए सबसे सस्ता स्रोत बन गया है, जो कोयले और गैस को भी पीछे छोड़ चुका है।
पैरामीटर2015 की स्थिति2025/2026 की स्थिति
अनुमानित वार्मिंग3.0C - 3.5C2.3C - 2.5C
सौर ऊर्जा लागतबेसलाइन (2010)90% की कमी
CO2 उत्सर्जनबढ़ रहा थारिकॉर्ड उच्च (38.4 बिलियन टन)
AI ऊर्जा खपतनगण्यवैश्विक बिजली का 1.5%

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'ओवरशूट' रणनीति क्या है?
यह एक ऐसी योजना है जिसमें वैश्विक तापमान अस्थायी रूप से 1.5C की सीमा को पार करेगा और फिर भारी उत्सर्जन कटौती के माध्यम से इसे वापस नीचे लाया जाएगा।

नवीकरणीय ऊर्जा सस्ती होने के बावजूद उत्सर्जन क्यों बढ़ रहा है?
इसका मुख्य कारण जीवाश्म ईंधन को छोड़ने की राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और AI जैसी नई तकनीकों की बढ़ती ऊर्जा मांग है।