मराठा आरक्षण कार्यकर्ता मनोज जरांगे-पाटिल ने कुनबी जाति प्रमाण पत्रों के सत्यापन और रद्दीकरण में विसंगतियों को लेकर महाराष्ट्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने 29 अगस्त की समयसीमा निर्धारित करते हुए बड़े आंदोलन की चेतावनी दी है।
मुख्य बातें
- मनोज जरांगे-पाटिल ने कुनबी प्रमाण पत्रों के सत्यापन में देरी और रद्दीकरण पर सरकार को घेरा।
- 29 अगस्त तक समाधान न होने पर 'अंतिम आंदोलन' की चेतावनी दी।
- चार महिला जनप्रतिनिधियों के प्रमाण पत्र रद्दीकरण ने विवाद को और हवा दी है।
- सरकार का तर्क है कि जाति स्क्रूटनी समितियां स्वतंत्र रूप से कार्य करती हैं।
मराठा आरक्षण कार्यकर्ता मनोज जरांगे-पाटिल ने एक बार फिर महाराष्ट्र सरकार के साथ टकराव की स्थिति पैदा कर दी है। इस बार विवाद कुनबी जाति प्रमाण पत्रों के सत्यापन, अनुमोदन और उनके अचानक रद्दीकरण को लेकर है। जरांगे-पाटिल ने आरोप लगाया है कि सरकार एक तरफ तो प्रमाण पत्र जारी करने की अनुमति देती है, लेकिन दूसरी तरफ उन्हें रद्द भी कर देती है, जो मराठा समुदाय को उनके हक से वंचित करने की एक सोची-समझी रणनीति है।
इस मुद्दे की गंभीरता तब बढ़ गई जब मराठवाड़ा क्षेत्र की चार महिला जनप्रतिनिधियों के कुनबी प्रमाण पत्र रद्द कर दिए गए। इनमें छत्रपति संभाजीनगर जिला परिषद सदस्य ज्योति शिंदे, गंगापुर नगर परिषद पार्षद वर्षा गायकवाड़, परभणी जिला परिषद सदस्य कोमल परवे और बीड के मजालगांव की पार्षद रेखा सरोदे शामिल हैं। रिपोर्टों के अनुसार, प्रमाण पत्र रद्द करने का कारण पितृ पक्ष के कुनबी रिश्तेदारों के दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत करने में विफलता बताया गया है।
क्यों है यह मुद्दा महत्वपूर्ण?
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह विवाद केवल प्रमाण पत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मराठा-कुनबी पहचान और आरक्षण के कानूनी आधार से जुड़ा है। 2025 के सरकारी प्रस्ताव के तहत, उन मराठों को आरक्षण का लाभ मिलता है जिनका वंश कुनबी समुदाय से जुड़ा है। न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) संदीप शिंदे समिति ने 58 लाख ऐसे प्रविष्टियों (entries) की पहचान की है, जो इस दावे को मजबूती प्रदान करती हैं।
"प्रमाण पत्रों का रद्दीकरण और सत्यापन में देरी मराठा समुदाय के भीतर असुरक्षा की भावना पैदा कर रही है।"
जरांगे-पाटिल ने सरकार के सामने 12 सूत्रीय प्रस्ताव रखा है, जिसमें ग्राम पंचायत स्तर पर दस्तावेजों का प्रदर्शन और प्रमाण पत्र देने में देरी करने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग शामिल है। दूसरी ओर, राजस्व मंत्री बावनकुले ने स्पष्ट किया है कि सरकार जाति स्क्रूटनी समितियों के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करती है, क्योंकि वे एक अर्ध-न्यायिक निकाय हैं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
मराठा आरक्षण का मुद्दा महाराष्ट्र की राजनीति में दशकों से चला आ रहा है। पिछले तीन वर्षों में, जरांगे-पाटिल ने इस मुद्दे को उठाने के लिए नौ बार भूख हड़ताल की है। कुनबी प्रमाण पत्रों के माध्यम से मराठा समुदाय को ओबीसी (OBC) श्रेणी के तहत आरक्षण दिलाने का प्रयास किया जा रहा है, जो राज्य में एक अत्यंत संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. कुनबी प्रमाण पत्र का विवाद क्या है?
विवाद यह है कि कई मराठा परिवारों को कुनबी होने का प्रमाण देने में कठिनाई हो रही है, और जो प्रमाण पत्र जारी किए गए थे, उन्हें कुछ अधिकारियों द्वारा रद्द किया जा रहा है।
2. जरांगे-पाटिल की अगली मांग क्या है?
उन्होंने 29 अगस्त तक प्रमाण पत्र प्रक्रिया में सुधार की मांग की है, अन्यथा वे एक बड़ा आंदोलन शुरू करेंगे।