पश्चिम बंगाल में पुलिस द्वारा मदरसों, मस्जिदों और ईदगाहों में बिना किसी आधिकारिक मुहर या सरकारी अधिसूचना के 'अनमार्क्ड प्रोफ़ार्मा' वितरित किए जाने से विवाद खड़ा हो गया है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने मुख्यमंत्री और पुलिस महानिदेशक से इस प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग की है।

मुख्य बातें

  • पश्चिम बंगाल के विभिन्न जिलों में पुलिस द्वारा मदरसों और मस्जिदों में संदिग्ध सर्वे फॉर्म बांटे जा रहे हैं।
  • फॉर्म में विदेशी फंडिंग, विदेशी आगंतुक और अंतरराष्ट्रीय सीमा से दूरी जैसे संवेदनशील सवाल पूछे गए हैं।
  • प्रपत्र (Proforma) पर किसी भी सरकारी अधिसूचना, मोहर या आदेश संख्या का अभाव है।
  • APCR ने इस कार्रवाई को लेकर मुख्यमंत्री से जांच और पारदर्शिता की मांग की है।

पश्चिम बंगाल के विभिन्न जिलों जैसे barrackpore, बीरभूम, मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर एवं दक्षिण 24 परगना में पुलिस द्वारा मदरसों, मस्जिदों और ईदगाहों में एक संदिग्ध 'प्रोफ़ार्मा' (सर्वे फॉर्म) वितरित किए जाने से राज्य में राजनीतिक और सामाजिक तनाव बढ़ गया है। इन फॉर्मों में धार्मिक संस्थानों से जुड़ी अत्यंत संवेदनशील जानकारी मांगी जा रही है, जिसमें विदेशी फंडिंग के स्रोत, पिछले तीन वर्षों में आए विदेशी आगंतुकों का विवरण और अंतरराष्ट्रीय सीमा से संस्थान की दूरी जैसे सवाल शामिल हैं।

बिना आधिकारिक मुहर के रात में छापेमारी का आरोप

स्थानीय धार्मिक संस्थानों के अधिकारियों और कर्मचारियों ने गंभीर आरोप लगाए हैं कि पुलिस की टीमें अक्सर देर रात (लगभग रात 12 बजे) इन फॉर्मों को वितरित करने पहुंचती हैं। निमता पुलिस स्टेशन के एक मामले का जिक्र करते हुए, कर्मचारियों ने बताया कि पुलिस ने अचानक आकर अगले दिन सुबह तक सभी विवरण जमा करने का दबाव बनाया। बीरभूम के लोहापीर जामा मस्जिद के प्रमुख अजीजुर रहमान ने कहा कि जब उन्होंने सरकारी अधिसूचना या आधिकारिक मुहर की मांग की, तो पुलिस ने कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दिया।

BozokMedia विश्लेषण: पारदर्शिता का संकट

BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, इस पूरी प्रक्रिया में सबसे बड़ी चिंता का विषय 'कानूनी वैधता' की कमी है। वितरित किए जा रहे फॉर्मों पर न तो किसी सरकारी अधिसूचना का संदर्भ है, न ही किसी जारी करने वाले अधिकारी का नाम, मुहर या मेमो नंबर है। जब कोई सरकारी या पुलिसिया कार्रवाई बिना किसी लिखित आदेश के की जाती है, तो यह नागरिक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता के लिए एक गंभीर खतरा बन सकती है।

"धार्मिक संस्थानों से संवेदनशील जानकारी एकत्र करने वाली किसी भी प्रक्रिया को एक स्पष्ट कानूनी ढांचे और पहचान योग्य सरकारी आदेश के आधार पर ही किया जाना चाहिए।" - उमर अवैस, सचिव, APCR

एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (APCR) ने मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी और पुलिस महानिदेशक सिद्धार्थ नाथ गुप्ता को एक ज्ञापन सौंपकर इस मामले की तत्काल जांच की मांग की है। कार्यकर्ताओं का तर्क है कि अल्पसंख्यक मामलों के विभाग द्वारा किया जाने वाला नियमित सर्वे और पुलिस द्वारा अलग से संवेदनशील जानकारी मांगना, दोनों अलग विषय हैं।

क्या यह लक्षित प्रोफाइलिंग है?

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने आशंका जताई है कि इस तरह के गैर-पारदर्शी सर्वेक्षणों का उद्देश्य किसी विशेष धार्मिक समुदाय की 'प्रोफाइलिंग' या उन्हें निशाना बनाना हो सकता है। उन्होंने मांग की है कि यदि यह एक आधिकारिक सरकारी सर्वेक्षण है, तो सरकार को अपना आदेश सार्वजनिक करना चाहिए।

क्या आप जानते हैं?: भारत में किसी भी धार्मिक संस्थान के विरुद्ध कानूनी जांच के लिए संबंधित विभाग द्वारा विधिवत जारी अधिसूचना का होना अनिवार्य है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. पुलिस किन जानकारियों की मांग कर रही है?
पुलिस विदेशी फंडिंग, विदेशी आगंतुकों का विवरण, स्टाफ की राजनीतिक संबद्धता और अंतरराष्ट्रीय सीमा से दूरी जैसी जानकारी मांग रही है।

2. APCR की मुख्य मांग क्या है?
APCR ने मांग की है कि इस सर्वेक्षण में पूर्ण पारदर्शिता बरती जाए और बिना किसी आधिकारिक सरकारी आदेश के ऐसी कार्रवाई न की जाए।