सीमा कलिरामना, 27 वर्षीय सीडब्ल्यूजी डिस्कस कांस्य पदक विजेता, अपनी पीएचडी शोध को प्रतियोगिता में एक रणनीतिक लाभ के रूप में उपयोग कर रही हैं। सकारात्मक आत्म‑संवाद और इमेजरी पर उनका अध्ययन उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से बेहतर तैयार करता है, जिससे वह एशियन गेम्स की ओर अग्रसर हैं।
मुख्य बिंदु
- सीमा की पीएचडी शोध ने प्रदर्शन में सुधार किया
- 58.65 मीटर से ग्लासगो में कांस्य पदक जीता
- अगले महीने एशियन गेम्स के लिए तैयारी जारी
पीएचडी और खेल का अनोखा संगम
नई दिल्ली – 27‑वर्षीय डिस्कस फेंकेली सीमा कलिरामना ने बताया कि वह हरिनिया के चौधरी बंसीलाल विश्वविद्यालय में इमेजरी और सकारात्मक आत्म‑संवाद पर अपनी पीएचडी कर रही हैं। यह शोध न केवल शैक्षणिक स्तर पर, बल्कि उनके दैनिक प्रशिक्षण में भी सम्मिलित है।
"मेरे शोध का विषय है इमेजरी और सकारात्मक आत्म‑संवाद का एथलेटिक प्रदर्शन पर प्रभाव," सीमा ने पीटीआई को बताया। "मैं इन सिद्धांतों को स्वयं पर लागू करती हूँ, जिससे प्रतिस्पर्धा के दौरान मन और शरीर दोनों को नियंत्रित कर पाती हूँ।"
ग्लासगो में कांस्य पदक और संघर्ष
ग्लासगो में आयोजित सीडब्ल्यूजी में 58.65 मीटर की फेंक से सीमा ने कांस्य पदक जिताया, जो 2025 एशियन चैम्पियनशिप में चूँकि केवल 16 सेंटीमीटर से चौथे स्थान पर रहने के बाद एक बड़ी वापसी थी। वह इस अंतर को "एक दर्दनाक सीख" के रूप में याद करती हैं, जिसने उन्हें अगली बार बेहतर तैयारी करने के लिए प्रेरित किया।
कठिन मौसम ने दिया नया अनुभव
ग्लासगो की ठंडी और तेज़ हवाओं ने प्रतियोगिता को चुनौतीपूर्ण बना दिया। सीमा ने कहा, "हवा सीधे हमारे सामने थी और डिस्कस हाथ से फिसल गई, लेकिन यह सीख हमें एशियन गेम्स में समान परिस्थितियों के लिए तैयार करती है।" उनका कोच और पति, रविंदर कलिरामना ने जोड़ा, "यदि मौसम अनुकूल होता तो शायद रंग अलग होता।"
एशियन गेम्स की तैयारी
परिवार और समर्थकों द्वारा स्वागत के बाद भी सीमा ने कहा, "एशियन गेम्स से एक महीने बाकी है, अब कोई ब्रेक नहीं। मेरा पूरा फोकस एशियन गेम्स पर है।"
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारतीय डिस्कस ने 1950 के दशक से अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी पहचान बनाई है, जिसमें अनीता शेरगिल और सविता बिंद्रा जैसे नाम शामिल हैं। सीमा की उपलब्धियां इस परंपरा को नई पीढ़ी के लिए जारी रखने का प्रतीक हैं।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows that integrating academic research with athletic training can create a competitive edge, especially in precision‑based events like discus where mental resilience directly influences physical execution.
"सकारात्मक आत्म‑संवाद न केवल आत्मविश्वास बढ़ाता है, बल्कि न्यूरोफिज़ियोलॉजी के स्तर पर प्रदर्शन को अनुकूलित करता है," कहा खेल मनोवैज्ञानिक डॉ. अजय सिंह ने।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: क्या सीमा की पीएचडी उनके भविष्य के कोचिंग में मदद करेगी?
उत्तर: हाँ, उनके शोध के परिणाम को कोचिंग सत्रों में लागू करके कई एथलीटों को लाभ हो सकता है।
प्रश्न 2: एशियन गेम्स में किन परिस्थितियों की तैयारी करनी होगी?
उत्तर: जापान के शरद ऋतु में ठंडी और उमस भरी हवा की संभावना है, इसलिए गर्मी प्रबंधन और ग्रिप तकनीक महत्वपूर्ण होगी।