दिल्ली सरकार ने बकाया इंफ्रास्ट्रक्चर शुल्क (IFC) न चुकाने वाले बड़े बिल्डरों और संपत्ति मालिकों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। करीब 2,000 करोड़ रुपये के राजस्व घाटे के बाद अब सीलिंग और जब्ती की कार्रवाई की चेतावनी दी गई है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • बकाया इंफ्रास्ट्रक्चर शुल्क (IFC) न चुकाने वाली इमारतों को सील किया जा सकता है।
  • 3,000 वर्ग मीटर से अधिक की 70% संपत्तियों ने अब तक शुल्क नहीं भरा है।
  • सरकार को लगभग 2,000 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान होने का अनुमान है।
  • एमएमसीडी (MCD) और दिल्ली जल बोर्ड के बीच मिलीभगत की जांच की जा रही है।

नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी में बुनियादी ढांचे के विकास के लिए निर्धारित अनिवार्य इंफ्रास्ट्रक्चर शुल्क (IFC) की वसूली को लेकर दिल्ली सरकार ने कड़ा रुख अपना लिया है। जल मंत्री परवेश साहिब सिंह ने घोषणा की है कि जो संपत्ति मालिक या बिल्डर बकाया शुल्क का भुगतान करने में विफल रहते हैं, उनके खिलाफ इमारतों को सील करने और संपत्ति जब्त करने जैसी सख्त कार्रवाई की जाएगी।

राजस्व का भारी नुकसान और अनियमितताएं

सरकार द्वारा की गई एक आंतरिक जांच में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 3,000 वर्ग मीटर और उससे अधिक क्षेत्रफल वाली लगभग 70% संपत्तियों ने अब तक IFC का भुगतान नहीं किया है। इस लापरवाही के कारण सरकारी खजाने को लगभग 2,000 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ है। सरकार ने पाया है कि कई मामलों में बिल्डरों ने दिल्ली जल बोर्ड (DJB) से अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) लेने के बजाय केवल इंजीनियरों के क्लीयरेंस लेटर के आधार पर नगर निगम (MCD) से बिल्डिंग प्लान पास करवा लिए।

भ्रष्टाचार और मिलीभगत की जांच

जल मंत्री ने संकेत दिया कि यह केवल भुगतान न करने का मामला नहीं है, बल्कि इसमें अधिकारियों और बिल्डरों के बीच गहरी मिलीभगत होने की आशंका है। अधिकारियों का कहना है कि कई बड़े प्रोजेक्ट्स, जहाँ करोड़ों रुपये का शुल्क बनता था, उन्हें कथित तौर पर इंजीनियरों और सेवानिवृत्त अधिकारियों के माध्यम से 'सेटल' कर दिया गया। सरकार ने पिछले पांच वर्षों में निर्मित सभी ऐसी संपत्तियों का विवरण मांगा है जिनका ऑडिट किया जाना है।

क्या है इंफ्रास्ट्रक्चर शुल्क (IFC)?

इंफ्रास्ट्रक्चर शुल्क (IFC) वह राशि है जो नए निर्माण या विस्तार के लिए पानी के कनेक्शन, सीवरेज लाइन, पाइपलाइन और सड़कों जैसी सुविधाओं के लिए ली जाती है। यह शुल्क 200 वर्ग मीटर से अधिक के भूखंडों पर लागू होता है। हालांकि, सरकार ने हाल ही में विभिन्न श्रेणियों की कॉलोनियों के लिए इस शुल्क में 50% से 70% तक की छूट देकर इसे सरल बनाने का प्रयास किया था, लेकिन बड़े पैमाने पर अनियमितताओं ने इस व्यवस्था को चुनौती दी है।