लद्दाख के LAC के किनारे बसे गाँवों के प्रतिनिधियों ने पर्यटन‑परिवहन‑संस्कृति समिति को बताया कि 2020 के युद्ध के बाद उन्हें अपने पारंपरिक चराई क्षेत्रों तक पहुँच नहीं मिल रही है। उन्होंने सुरक्षा एजेंसियों के समन्वय से नियंत्रित पहुँच की माँग की, यह कहा कि स्थानीय समुदाय की उपस्थिति राष्ट्रीय सुरक्षा की रीढ़ है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • 2020 के सीमा टकराव के बाद लद्दाख के गाँवों को चराई भूमि से वंचित किया गया।
  • स्थानीय समुदाय की निरंतर उपस्थिति राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अहम है।
  • समिति ने गाँवों की शिकायतों को सुलझाने का आश्वासन दिया।

लद्दाख के लेह जिले के मैन पोंगोंग ए और बी गांवों के 15 प्रतिनिधियों ने संसद के पर्यटन‑परिवहन‑संस्कृति स्थायी समिति को अपने सामने रखे गंभीर मुद्दे प्रस्तुत किए। उन्होंने बताया कि 2020 में गालवान घाटी में हुए हिंसक टकराव के बाद चीनी सेना ने LAC के पास अपनी तैनाती बढ़ा दी, जिससे स्थानीय पशुपालकों को पारंपरिक चराई क्षेत्रों में प्रवेश से रोक दिया गया।

पृष्ठभूमि

3,488 किमी लंबी लिंन ऑफ़ एक्टुअल कंट्रोल (LAC) के साथ लद्दाख, भारत‑चीन सीमा पर सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में से एक है। अप्रैल‑मई 2020 में PLA ने ईस्टर्न लद्दाख में बड़ी संख्या में सैनिक और हथियार जमा कर लिये, और भारतीय क्षेत्र में किलेबंदी जैसी संरचनाएँ बनायीं। यह कदम क्षेत्र में स्थायी स्थिति बदलने की कोशिश के रूप में देखा गया।

2020 की सीमा टकराव और उसके बाद की परिस्थितियाँ

15 जून 2020 को गालवान में हुई घातक लड़ाई में 20 भारतीय सैनिक मारे गये, जबकि उसी वर्ष मई में पोंगोंग टसो के उत्तर तट पर 70 से अधिक सैनिक घायल हुए। इन घटनाओं के बाद भारतीय सेना ने कई पैट्रोलिंग बिंदुओं को बंद कर दिया, जिससे स्थानीय पशुपालकों को अपने गोरू और बकरियों की चारा‑चरण के लिए जाने वाले क्षेत्रों से दूर होना पड़ा।

स्थानीय समुदायों की भूमिका

पशुपालक समुदाय ने 1962, 1971, 1999 के युद्धों में भारतीय सेना को रीयल‑टाइम सूचना और कठिन भू‑स्थानिक मदद प्रदान करके द्वितीय रेखा की भूमिका निभाई है। इस परंपरा को जारी रखने के लिए उन्हें चराई भूमि, जल, लकड़ी आदि संसाधनों तक पहुँच आवश्यक है। आज सेना के रोकथाम के कारण न तो मिट्टी लाने की अनुमति है, न ही आग के लिए लकड़ी इकट्ठा करना।

संसद समिति की प्रतिक्रिया

समिति के अध्यक्ष, जनता दल‑यूनाइटेड के संजय झा ने कहा कि वे इस मुद्दे को उच्चतम स्तर पर ले जाएँगे और सुरक्षा एजेंसियों के साथ मिलकर नियंत्रित पहुँच की व्यवस्था करेंगे। प्रतिनिधियों ने यह भी माँग की कि सीमा‑निवासियों के बलिदान को राष्ट्रीय स्मारकों में सम्मिलित किया जाये और पर्यटन‑विकास हेतु विशेष छूट प्रदान की जाये।

भविष्य की दिशा

फोब्रंग‑त्सोग्त्सालु रोड को रक्षा मंत्रालय के अधीन ले जाने की भी मांग की गयी, जिससे इसकी रख‑रखाव और उन्नयन के लिए आवश्यक फंडिंग सुनिश्चित हो सके। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थानीय जनसंख्या को सुरक्षित और आर्थिक रूप से सुदृढ़ किया गया तो यह भारत‑चीन सीमा की स्थिरता में एक अतिरिक्त सुरक्षा परत जोड़ सकता है।