भारत सरकार ने यूरिया-2026 के तहत राष्ट्रीय निवेश नीति को मंजूरी दी, जिससे गैस‑आधारित यूरेया संयंत्रों में नई निवेशों को प्रोत्साहन मिलेगा। 33 मौजूदा इकाइयों की कुल क्षमता 269.42 लाख टन है, लेकिन घरेलू उत्पादन को बढ़ाने की तात्कालिक आवश्यकता है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- निवेश नीति के तहत नई गैस‑आधारित यूरिया इकाइयों को प्रोत्साहन मिलेगा।
- देश में 33 कार्यरत इकाइयाँ 2.69 लाख टन की क्षमता के साथ चल रही हैं।
- आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को साकार करने हेतु घरेलू उत्पादन को बढ़ाने की रणनीति तय।
न्यू दिल्ली: केंद्र ने बुधवार को यूरिया‑2026 के नाम से राष्ट्रीय निवेश नीति (NIP) को मंजूरी दी, जिससे देश में उर्वरक उत्पादन में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया। इस नीति को आर्थिक मामलों के मंत्रिमंडल (CCEA) ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में स्वीकृत किया, और यह उपज विभाग द्वारा तैयार किया गया प्रस्ताव है।
पृष्ठभूमि और मौजूदा स्थिति
वर्तमान में भारत में 33 परिचालन यूरिया उत्पादन इकाइयाँ हैं, जिनकी पुनर्मूल्यांकन‑स्थापित क्षमता 269.42 लाख टन (LMT) है। हालांकि, देश की कुल उर्वरक आवश्यकता लगभग 4 लाख टन से अधिक है, जिससे बड़ी मात्रा में आयात पर निर्भरता बनी हुई है। इस अंतर को पाटने के लिए सरकार ने पिछले वर्षों में कई पहलें शुरू की थीं, पर 2019 में समाप्त हुई NIP‑2012 की अवधि के बाद नई योजनाओं की कमी स्पष्ट हो गई।
नई नीति के मुख्य प्रावधान
नयी निवेश नीति के तहत गैस‑आधारित यूरिया संयंत्रों की स्थापना को विशेष प्रोत्साहन मिलेगा। यह प्रोत्साहन कर रियायतें, पूंजीगत सब्सिडी और आसान वित्तीय शर्तों के रूप में प्रदान किया जाएगा। नीति के अंतर्गत निजी कंपनियों के साथ-साथ सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम (PSUs) के संयुक्त उद्यमों को भी भागीदारी के लिए आमंत्रित किया गया है, जिससे निवेश का आधार विस्तारित होगा।
आर्थिक और सामाजिक प्रभाव
यदि नई इकाइयाँ नियोजित समय पर स्थापित हो जाती हैं, तो घरेलू उत्पादन में संभावित वृद्धि 1.5‑2 लाख टन तक हो सकती है, जिससे आयात लागत में उल्लेखनीय कमी आएगी। इससे विदेशी मुद्रा बचत, रोजगार सृजन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। साथ ही, स्वच्छ गैस‑आधारित उत्पादन तकनीक पर्यावरणीय प्रभाव को भी घटाएगी, जिससे भारत के जलवायु लक्ष्य के साथ तालमेल बिठेगा।
आगे का मार्ग
निवेश नीति की सफल कार्यान्वयन के लिए सरकारी विभागों, राज्य सरकारों और निजी उद्योग के बीच समन्वय आवश्यक होगा। नीति के प्रावधानों को समय पर लागू करने, अनुदान प्रक्रिया को सरल बनाने और पारदर्शी निगरानी प्रणाली स्थापित करने से निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा। इस पहल को भारत के “आत्मनिर्भर भारत” अभियान के प्रमुख स्तंभों में से एक माना जा रहा है।