जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की सेहत में भारी गिरावट आई है; 19 दिनों के अनिश्चित उपवास के कारण उनका वजन 9 किलो से अधिक कम हो गया है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- सोनम वांगचुक का वजन अब घटकर 56.90 किलोग्राम रह गया है।
- 19 दिनों के उपवास के कारण उनकी शारीरिक स्थिति काफी कमजोर हो गई है।
- CJP ने सरकार से परीक्षा सुधारों और छात्रों की मांगों पर तुरंत बात करने की अपील की है।
- प्रदर्शनकारियों ने 20 जुलाई को संसद मार्च की भी घोषणा की है।
प्रसिद्ध जलवायु कार्यकर्ता और लद्दाख के मुखर नेता सोनम वांगचुक की हालत चिंताजनक बनी हुई है। उनके अनिश्चित भूख हड़ताल के 19वें दिन, कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने एक आधिकारिक बयान जारी कर बताया कि वांगचुक का स्वास्थ्य तेजी से गिर रहा है। चिकित्सा रिपोर्टों के अनुसार, उपवास की शुरुआत से अब तक उन्होंने 9 किलोग्राम से अधिक वजन खो दिया है, जिससे उनका वर्तमान वजन मात्र 56.90 किलोग्राम रह गया है।
चिकित्सा स्थिति और स्वास्थ्य डेटा
गुरुवार (16 जुलाई, 2026) सुबह की मेडिकल जांच में वांगचुक के महत्वपूर्ण स्वास्थ्य संकेत (vitals) काफी अस्थिर पाए गए। हालांकि CJP ने दावा किया है कि वह अभी भी 'मानसिक रूप से सतर्क' हैं, लेकिन उनका शारीरिक बल काफी कम हो गया है। उनकी ब्लड प्रेशर रीडिंग 101/65 mmHg दर्ज की गई, जबकि पल्स रेट 72 बीट प्रति मिनट और ऑक्सीजन सैचुरेशन 98% पर स्थिर है। रक्त शर्करा (Blood Sugar) का स्तर 89 mg/dL पाया गया। वह वर्तमान में निरंतर चिकित्सा निगरानी के अधीन हैं।
विरोध का कारण और राजनीतिक मांगें
यह भूख हड़ताल मुख्य रूप से NEET परीक्षा में कथित अनियमितताओं और शिक्षा प्रणाली में व्यापक सुधारों की मांग को लेकर की जा रही है। CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके और अन्य समर्थकों ने केंद्र सरकार पर दबाव डालते हुए मांग की है कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को तुरंत अपने पद से इस्तीफा देना चाहिए। प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता की कमी देश के लाखों छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रही है।
आगामी आंदोलन और सामाजिक प्रभाव
वांगचुक की बिगड़ती स्थिति ने देश भर में एक नई बहस छेड़ दी है। CJP ने नागरिकों से अपील की है कि वे 20 जुलाई को होने वाले शांतिपूर्ण 'संसद मार्च' में शामिल हों। यह आंदोलन न केवल शिक्षा सुधारों के लिए है, बल्कि यह छात्रों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक बड़े जन-आंदोलन में बदलता दिख रहा है। सरकार की चुप्पी और वांगचुक की गिरती सेहत ने मानवाधिकार समूहों और शिक्षाविदों के बीच गहरी चिंता पैदा कर दी है।