दिल्ली उच्च न्यायालय ने पत्रकारिता की नैतिकता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल उठाए हैं, जहाँ कोर्ट ने कहा कि केवल उपकरण होने से कोई रिपोर्टर नहीं बन जाता।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि बिना प्रशिक्षण और नैतिकता के खुद को रिपोर्टर घोषित करना पत्रकारिता नहीं है।
- यह टिप्पणी यूट्यूब चैनल के लिए काम करने वाले दो फ्रीलांस पत्रकारों पर हुए हमले के मामले में की गई।
- न्यायाधीश ने सोशल मीडिया के दौर में अनियंत्रित और असंगठित मीडिया के बढ़ते प्रभाव पर चिंता जताई।
- कोर्ट ने विधायिका से पत्रकारिता के लिए एक उचित नियामक ढांचा (Regulatory Framework) बनाने का आग्रह किया।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल ही में मीडिया जगत में बढ़ते 'सेल्फ-स्टाइलड' या स्वयंभू पत्रकारों की बढ़ती संख्या पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और तीखी टिप्पणी की है। न्यायमूर्ति गिरीश कठपालिया ने स्पष्ट किया कि आज के डिजिटल युग में, जिसके पास भी एक मोबाइल फोन और एक माइक्रोफोन है, वह खुद को 'रिपोर्टर' घोषित कर सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वह पत्रकारिता के मानदंडों का पालन कर रहा है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह टिप्पणी 16 जुलाई को तब की गई जब अदालत ने दो व्यक्तियों को जमानत दी, जिन पर दिल्ली के सीमापुरी इलाके में एक यूट्यूब चैनल के लिए काम कर रहे दो फ्रीलांस पत्रकारों के साथ मारपीट करने का आरोप था। घटना के अनुसार, पत्रकार एक ऐसे धार्मिक स्थल की रिकॉर्डिंग कर रहे थे जिसे कथित तौर पर बिना अनुमति के बनाया गया था। इस दौरान स्थानीय निवासी उग्र हो गए और उन्होंने पत्रकारों का पीछा करते हुए एक बस में भी उनके साथ हमला कर दिया।
अनियंत्रित मीडिया और नैतिक संकट
सुनवाई के दौरान, अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि पत्रकारों पर हमला 'प्रेस की स्वतंत्रता' पर हमला है। हालांकि, अदालत ने इस पर विचार करते हुए कहा कि ये पत्रकार किसी मान्यता प्राप्त समाचार संगठन से नहीं जुड़े थे, बल्कि एक यूट्यूब चैनल के लिए फ्रीलांसिंग कर रहे थे। न्यायाधीश कठपालिया ने चिंता व्यक्त की कि सोशल मीडिया के प्रसार के साथ, मीडिया का एक बड़ा हिस्सा पूरी तरह से अनियंत्रित और असंगठित हो गया है।
जवाबदेही की आवश्यकता
अदालत ने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि कैसे ये तथाकथित रिपोर्टर नागरिकों पर माइक थमाकर तुरंत जवाब देने का दबाव बनाते हैं। यदि कोई नागरिक चुप रहने का अधिकार चुनता है, तो ये रिपोर्टर कैमरे के सामने उसे 'सवाल से भागने वाला' घोषित कर देते हैं, जिससे भ्रामक नैरेटिव तैयार होता है। न्यायमूर्ति ने अंत में कहा कि प्रेस की स्वतंत्रता को संरक्षित किया जाना चाहिए, लेकिन इसे गैर-जिम्मेदार पत्रकारिता या सार्वजनिक व्यवस्था को खतरे में डालने वाले कंटेंट के लिए 'ढाल' के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। उन्होंने विधायिका से पत्रकारिता के लिए एक उचित नियामक ढांचे पर विचार करने का आह्वान किया।