सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में विशेष गहन संशोधन (SIR) के तहत मतदाता सूची से हटाए गए व्यक्तियों के कल्याणकारी लाभों को लेकर चुनाव आयोग और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची से नाम हटने के बाद कल्याणकारी योजनाओं से वंचित किए जाने के मुद्दे पर नोटिस जारी किया।
- याचिका में तर्क दिया गया है कि PDS और अन्नपूर्णा जैसी योजनाओं से लोगों को नहीं रोका जाना चाहिए।
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग नागरिकता का निर्णय नहीं ले सकता, यह कार्य गृह मंत्रालय का है।
- विशेष न्यायाधिकरणों में लगभग 34 लाख अपीलें लंबित होने का दावा किया गया है।
नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण मामले में हस्तक्षेप करते हुए चुनाव आयोग (ECI) और पश्चिम बंगाल सरकार को नोटिस जारी किया है। मामला इस गंभीर प्रश्न से जुड़ा है कि क्या 'विशेष गहन संशोधन' (SIR) प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए गए व्यक्तियों को सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के लाभों से वंचित किया जा सकता है।
कानूनी संघर्ष और मानवीय संकट
प्रसेनजीत बोस द्वारा दायर इस याचिका में तर्क दिया गया है कि केवल मतदाता सूची से नाम कट जाने मात्र से किसी नागरिक को सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS), अन्नपूर्णा योजना और अन्य महत्वपूर्ण सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों से बाहर नहीं किया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता के वकील, वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत को बताया कि मतदाता सूची से नाम हटने का प्रभाव केवल मतदान तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जाति प्रमाण पत्र, सत्यापन और अन्य बुनियादी अधिकारों पर भी संकट आ जाता है।
न्यायालय की टिप्पणी और बिहार का संदर्भ
सुनवाई के दौरान, मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले की गंभीरता को समझा। न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची ने उल्लेख किया कि बिहार के SIR मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही यह स्पष्ट कर चुका है कि चुनाव आयोग के पास मतदाता सूची के प्रबंधन का अधिकार तो है, लेकिन वह किसी व्यक्ति की नागरिकता तय करने का अधिकार नहीं रखता। यदि नागरिकता पर संदेह है, तो चुनाव आयोग को मामला गृह मंत्रालय को सौंपना चाहिए ताकि नागरिकता अधिनियम के तहत निर्णय लिया जा सके।
पारदर्शिता की मांग और लंबित मामले
अदालत में यह भी बताया गया कि वर्तमान में विशेष न्यायाधिकरणों के पास लगभग 34 लाख अपीलें लंबित हैं, जबकि केवल 19 न्यायाधिकरणों के माध्यम से अब तक बहुत कम मामलों का निपटारा हुआ है। याचिकाकर्ता ने मांग की है कि इन न्यायाधिकरणों की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लाने के लिए उनकी वेबसाइटें होनी चाहिए और सभी आदेश सार्वजनिक किए जाने चाहिए। अदालत ने इस मामले को 25 जुलाई से पहले सूचीबद्ध करने का संकेत दिया है।