दक्षिण एशिया में श्रीलंका, बांग्लादेश और भारत में युवाओं ने सरकारों को हिला दिया है, लेकिन पाकिस्तान की 'जेन-जी' इस लहर से दूर क्यों है? जानिए इसके गहरे राजनीतिक कारण।

मुख्य बातें

  • दक्षिण एशिया के कई देशों में छात्र-नेतृत्व वाले आंदोलनों ने सत्ता परिवर्तन किया है।
  • पाकिस्तान में छात्र संघों पर दशकों से प्रतिबंध है, जिससे संगठित विरोध की कमी है।
  • आर्थिक संकट और बेरोजगारी के बावजूद पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर युवा विद्रोह नहीं देखा गया है।

दक्षिण एशिया में पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह बदल गया है। श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल जैसे देशों में छात्र-नेतृत्व वाले आंदोलनों ने सरकारों को घुटनों पर ला दिया है। यहाँ तक कि हाल ही में भारत में भी 'कॉकरोच जनता पार्टी' के नेतृत्व में हुए युवा विरोध प्रदर्शनों ने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे तक की स्थिति पैदा कर दी। लेकिन इन सबके बीच, एक पड़ोसी देश—पाकिस्तान—इस लहर से पूरी तरह कटा हुआ नजर आ रहा है।

क्या पाकिस्तान में युवा आक्रोश की कमी है?

हैरानी की बात यह है कि पाकिस्तान में वे सभी कारक मौजूद हैं जो एक बड़े जन-आंदोलन को जन्म दे सकते हैं। देश की अर्थव्यवस्था IMF के बेलआउट पैकेज पर टिकी है, बेरोजगारी दर आसमान छू रही है, और राजनीतिक सत्ता पर सेना का गहरा प्रभाव है। विदेश नीति विश्लेषक माइकल कुगलेमान के अनुसार, भ्रष्टाचार, दमन और बेरोजगारी जैसे कारक पाकिस्तान में भी मौजूद हैं, फिर भी वहां वह सामूहिक विद्रोह क्यों नहीं दिख रहा जो पड़ोसियों में दिखा?

क्यों यह महत्वपूर्ण है?

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि किसी भी देश में क्रांति केवल गुस्से से नहीं, बल्कि संगठित ढांचे से आती है। पाकिस्तान में युवाओं के पास गुस्सा तो है, लेकिन उनके पास वह संगठित मंच नहीं है जो उनके गुस्से को एक राजनीतिक शक्ति में बदल सके।

पाकिस्तान में छात्र संघों पर लगा प्रतिबंध युवाओं की राजनीतिक शक्ति को जमीनी स्तर पर संगठित होने से रोकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान के छात्र राजनीति के कमजोर होने का सबसे बड़ा कारण जनरल जिया-उल-हक के दौर में छात्र संघों पर लगाया गया प्रतिबंध है। 1980 के दशक में लगाए गए इस प्रतिबंध ने शिक्षण संस्थानों को राजनीतिक चेतना के केंद्रों के बजाय केवल डिग्री प्राप्त करने के स्थानों में बदल दिया।

विभाजित आंदोलन और चुनौतियाँ

पाकिस्तान में विरोध की कमी नहीं है; बलूचिस्तान में स्वायत्तता की मांग और अन्य क्षेत्रों में मानवाधिकारों के लिए आवाज उठाई जाती है। हालांकि, ये आंदोलन अक्सर स्थानीय या विशिष्ट मुद्दों तक सीमित रह जाते हैं और एक व्यापक राष्ट्रीय मोर्चा बनाने में विफल रहते हैं।

क्या आप जानते हैं?: 1968-69 के बड़े जन-आंदोलन में पाकिस्तान के छात्र ही सबसे आगे थे, जिन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति अयूब खान को इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया था।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. पाकिस्तान में छात्र राजनीति क्यों कमजोर है?
जनरल जिया-उल-हक के शासनकाल में छात्र संघों पर लगाए गए प्रतिबंध के कारण छात्र राजनीति का ढांचा पूरी तरह नष्ट हो गया।

2. क्या पाकिस्तान के युवा राजनीतिक रूप से उदासीन हैं?
नहीं, सोशल मीडिया पर सक्रियता और विभिन्न क्षेत्रीय आंदोलनों से स्पष्ट है कि युवा जागरूक हैं, लेकिन वे संगठित नहीं हैं।