जैसे-जैसे नए सुरक्षा समझौते मध्य पूर्व को नया आकार दे रहे हैं, भारत के लिए ईरान और अफगानिस्तान के साथ अपने राजनयिक संबंधों को फिर से परिभाषित करना एक महत्वपूर्ण मोड़ बन गया है।
- उभरती सुरक्षा संरचनाओं के कारण पश्चिम एशिया में भारत का प्रभाव कम हो रहा है।
- मक्का सुरक्षा समझौते ने एक नई शक्ति गतिशीलता पैदा की है, जिसके लिए रणनीतिक बदलाव आवश्यक है।
- भारत के लिए अब ईरान और अफगानिस्तान के साथ संबंधों को मजबूत करना एक भू-राजनीतिक आवश्यकता है।
पश्चिम एशिया का भू-राजनीतिक परिदृश्य एक बड़े बदलाव से गुजर रहा है। वजिरम एंड रवि और द हिंदू के हालिया संपादकीय विश्लेषण बताते हैं कि मक्का सुरक्षा समझौते जैसे नए सुरक्षा ढांचों के कारण भारत का पारंपरिक दृष्टिकोण अब चुनौतीपूर्ण हो गया है। हालांकि भारत ने ऐतिहासिक रूप से विभिन्न खाड़ी देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखे हैं, लेकिन स्थानीय सुरक्षा संरचनाओं का उदय नई दिल्ली के रणनीतिक हितों को हाशिए पर धकेलने का खतरा पैदा करता है।
विवेकनंद इंटरनेशनल फाउंडेशन (VIF) इस बात पर जोर देता है कि भारत को खाड़ी के 'परिधि' क्षेत्रों—विशेष रूप से ईरान और अफगानिस्तान—पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए। लंबे समय तक भारत का ध्यान केवल तेल समृद्ध राजतंत्रों पर रहा है, जिससे तेहरान और काबुल द्वारा प्रदान की जाने वाली रणनीतिक गहराई की अनदेखी हुई। अस्थिर सुरक्षा समझौतों के दौर में, ये दो देश भारत की कनेक्टिविटी महत्वाकांक्षाओं, विशेष रूप से अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) के लिए महत्वपूर्ण बफर और प्रवेश द्वार के रूप में कार्य करते हैं।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि वर्तमान राजनयिक जड़ता पश्चिम एशिया में प्रभाव के स्थायी नुकसान का कारण बन सकती है। यदि भारत खुद को नई सुरक्षा संरचना में एकीकृत करने में विफल रहता है, तो वह क्षेत्रीय निर्णय लेने की प्रक्रियाओं से बाहर होने का जोखिम उठाता है। मक्का सुरक्षा समझौता शक्ति के एक ऐसे एकीकरण का प्रतिनिधित्व करता है जो भारत की राजनयिक चपलता के आधार पर या तो एक बाधा या एक सेतु बन सकता है।
"पश्चिम एशिया में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता अब विलासिता नहीं बल्कि एक बहुध्रुवीय क्षेत्रीय व्यवस्था में जीवित रहने की आवश्यकता है।"
ऐतिहासिक रूप से, पश्चिम एशिया के साथ भारत का जुड़ाव मुख्य रूप से ऊर्जा सुरक्षा और प्रवासियों के कल्याण से प्रेरित था। हालांकि, 21वीं सदी 'सुरक्षा साझेदारी' की ओर संक्रमण की मांग करती है। एक लेन-देन संबंधी रिश्ते से रणनीतिक रिश्ते की ओर बढ़ने का अर्थ है आतंकवाद विरोधी अभियानों, समुद्री सुरक्षा और खुफिया जानकारी साझा करने में सहयोग करना, जो केवल व्यापार और प्रेषण (remittances) के दायरे से परे है।
इसके अलावा, अफगानिस्तान की स्थिति एक अस्थिर चर बनी हुई है। काबुल में एक स्थिर और मित्रवत प्रशासन के बिना, बुनियादी ढांचे में भारत का निवेश और सीमा पार आतंकवाद को रोकने के प्रयास जोखिम में हैं। नए सुरक्षा समझौतों और अफगानिस्तान में अस्थिरता के बीच का अंतर्संबंध एक ऐसा शून्य पैदा करता है जिसे प्रतिद्वंद्वी शक्तियां भरने के लिए उत्सुक हैं।
| रणनीतिक स्तंभ | पुराना दृष्टिकोण (लेन-देन) | नया दृष्टिकोण (रणनीतिक) |
|---|---|---|
| प्राथमिक लक्ष्य | ऊर्जा और प्रेषण | सुरक्षा और भू-राजनीतिक प्रभाव |
| प्रमुख भागीदार | GCC राजतंत्र | ईरान, अफगानिस्तान और GCC |
| केंद्र बिंदु | व्यापार समझौते | सुरक्षा संरचना और कनेक्टिविटी |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: भारत के लिए मक्का सुरक्षा समझौते का क्या महत्व है?
उत्तर 1: यह एक नए क्षेत्रीय सुरक्षा संरेखण का प्रतिनिधित्व करता है जो भारत को या तो हाशिए पर धकेल सकता है या यदि वह अपनी कूटनीति को अनुकूलित करता है तो जुड़ाव का एक संरचित तरीका प्रदान कर सकता है।
प्रश्न 2: भारत की वर्तमान रणनीति के लिए ईरान और अफगानिस्तान क्यों महत्वपूर्ण हैं?
उत्तर 2: वे आवश्यक रणनीतिक गहराई प्रदान करते हैं और मध्य एशिया और यूरोप के लिए भारत के कनेक्टिविटी के प्राथमिक प्रवेश द्वार हैं।