मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में सक्रिय तेंदुए के शिकार और तस्करी के एक बड़े अंतरराज्यीय नेटवर्क का पर्दाफाश हुआ है, जिसमें दिल्ली के एक वन्यजीव संरक्षण एनजीओ की संदिग्ध भूमिका सामने आई है।

  • पाँच राज्यों में फैले तेंदुए के शिकार और तस्करी नेटवर्क के 9 आरोपी गिरफ्तार।
  • आगरा और आसपास के इलाकों में छापेमारी के दौरान 10 तेंदुए की खाल और अन्य अवशेष बरामद।
  • गिरफ्तार तस्करों और दिल्ली स्थित एक वन्यजीव संरक्षण एनजीओ के बीच संदिग्ध संबंधों की जांच जारी।

वन्यजीव अपराध के खिलाफ एक बड़ी कार्रवाई में, उत्तर प्रदेश वन विभाग, मध्य प्रदेश स्टेट टाइगर स्ट्राइक फोर्स (STSF) और वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (WCCB) ने मिलकर एक अंतरराज्यीय तेंदुए शिकार नेटवर्क का भंडाफोड़ किया है। यह नेटवर्क मध्य प्रदेश के जंगलों से लेकर दिल्ली और राजस्थान के बाजारों तक फैला हुआ था।

इस जांच की शुरुआत 23 जुलाई को आगरा-ग्वालियर हाईवे पर स्थित सइयां क्षेत्र के राजपूतना होटल में हुई एक छापेमारी से हुई। इस ऑपरेशन में चार संदिग्ध तस्करों को गिरफ्तार किया गया, जिनके पास से तेंदुए की खाल और कटे हुए सिर बरामद हुए, जिससे इस बड़े सिंडिकेट के तार जुड़े।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि इस मामले का सबसे चिंताजनक पहलू संरक्षण संगठनों में शिकार नेटवर्क की संभावित घुसपैठ है। जब किसी वन्यजीव एनजीओ से जुड़े लोग तस्करी में पकड़े जाते हैं, तो यह विश्वास के गंभीर उल्लंघन और संवेदनशील वन खुफिया जानकारी के लीक होने का संकेत देता है, जो राष्ट्रीय संरक्षण प्रयासों को खतरे में डाल सकता है।

जांच तब और गंभीर हो गई जब वन्यजीव तस्करी के पुराने अपराधी भगवान सिंह उर्फ सलीम और उसके सहयोगी वसीम की गिरफ्तारी हुई। जांचकर्ताओं ने पाया कि ये दोनों व्यक्ति पिछले पांच वर्षों से दिल्ली के एक वन्यजीव संरक्षण एनजीओ से जुड़े थे। STSF ने अब एनजीओ के सीईओ को शिवपुरी में पेश होने का नोटिस जारी किया है ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या संगठन के संसाधनों का उपयोग तस्करी के लिए किया गया था।

संरक्षण के मुखौटे और शिकार सिंडिकेट का यह मेल वन्यजीव अपराध में एक नए और परिष्कृत विकास को दर्शाता है, जिसके लिए गहन खुफिया निगरानी की आवश्यकता है।

शिकार का तरीका बेहद क्रूर था। पूछताछ में आरोपियों ने बताया कि तेंदुओं को नायलॉन के जालों में फंसाया जाता था और फिर उन्हें डंडों से पीट-पीटकर मार दिया जाता था। इस गिरोह ने कुनो वन्यजीव प्रभाग (6 तेंदुए), श्योपुर (2 तेंदुए) और मुरैना के चंबल अभयारण्य (2 तेंदुए) को अपना शिकार बनाया। सबूत मिटाने के लिए खाल, पंजे, दांत और मूंछें निकालने के बाद शवों को जंगल में ही गड्ढों में दफना दिया जाता था।

वर्तमान में, STSF इस पूरे सप्लाई चेन का नक्शा तैयार कर रही है, ताकि हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली के उन खरीदारों और फाइनेंसरों तक पहुँचा जा सके जिन्होंने इस अवैध व्यापार को बढ़ावा दिया।

क्या आप जानते हैं?: तेंदुए की खाल और शरीर के अंगों की अंतरराष्ट्रीय बाजारों में विलासिता की सजावट और पारंपरिक दवाओं के लिए भारी मांग होती है, जो इस तरह के क्रूर शिकार का मुख्य कारण है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस नेटवर्क के मुख्य शिकार क्षेत्र कौन से थे?
शिकार मुख्य रूप से कुनो वन्यजीव प्रभाग, श्योपुर और मुरैना के चंबल अभयारण्य में किया गया था।

दिल्ली एनजीओ की संलिप्तता की वर्तमान स्थिति क्या है?
एनजीओ के सीईओ को पूछताछ के लिए बुलाया गया है, लेकिन संगठन की आधिकारिक संलिप्तता अभी तक कानूनी रूप से स्थापित नहीं हुई है।