कर्नाटक में तीन तमिल भाषियों की मौत ने 2015 के उस भीषण हादसे की याद दिला दी है, जब आंध्र प्रदेश के शेषचलम जंगलों में 20 लकड़हारों को पुलिस ने गोलियों से भून दिया था। यह घटना वन संरक्षण और मानवाधिकारों के बीच के संघर्ष को फिर से उजागर करती है।
- कर्नाटक में हाल ही में हुई तीन मौतों ने 2015 के शेषचलम नरसंहार की यादें ताजा कर दी हैं।
- 2015 में आंध्र प्रदेश टास्क फोर्स ने कथित आत्मरक्षा में 20 तमिल लकड़हारों को मार डाला था।
- मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने तत्कालीन FIR को 'गढ़ा हुआ' और 'फर्जी' बताया था।
- इस घटना ने तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के बीच गंभीर राजनीतिक तनाव पैदा किया था।
हाल ही में कर्नाटक के जंगलों में कथित तौर पर शिकार और गोलीबारी की घटना में तीन तमिल भाषी पुरुषों की मौत हो गई। इस दुखद घटना ने भारत के इतिहास के एक ऐसे काले अध्याय की याद दिला दी है जिसने 11 साल पहले पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। यह मामला केवल कानून व्यवस्था का नहीं, बल्कि सीमावर्ती राज्यों के मजदूरों की सुरक्षा और वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: शेषचलम का खूनी मंजर
7 अप्रैल, 2015 को आंध्र प्रदेश के तिरुमाला पहाड़ियों की तलहटी में स्थित शेषचलम वन क्षेत्र में एक ऐसी घटना घटी जिसे 'लाल चंदन तस्करी विरोधी टास्क फोर्स' ने एक मुठभेड़ बताया, लेकिन दुनिया ने इसे एक नरसंहार के रूप में देखा। उस दिन, तमिलनाडु के तिरुवन्नामलई, विल्लुपुरम और वेल्लोर जिलों के 20 गरीब दिहाड़ी मजदूर, जो लकड़ी काटने का काम करते थे, पुलिस और वन विभाग की गोलियों का शिकार हो गए।
टास्क फोर्स का दावा था कि उन्होंने 100 से अधिक लकड़हारों को पेड़ काटते हुए पाया और जब उन्होंने आत्मसमर्पण करने को कहा, तो मजदूरों ने उन पर पत्थर और हंसिया से हमला किया। जवाब में, सुरक्षा बलों ने 'आत्मरक्षा' में गोलियां चलाईं, जिससे 20 लोग मारे गए। हालांकि, इस दावे पर तब सवाल उठे जब यह पता चला कि मुठभेड़ से ठीक तीन दिन पहले टास्क फोर्स के प्रमुख एम. कांथा राव ने सरकार से अवैध प्रवेश करने वालों पर गोली चलाने की अनुमति मांगी थी।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows कि यह पैटर्न दर्शाता है कि वन संपदा की सुरक्षा के नाम पर अक्सर हाशिए पर रहने वाले गरीब मजदूरों को बलि का बकरा बनाया जाता है। जब राज्य की सुरक्षा एजेंसियां 'एनकाउंटर' को एकमात्र समाधान मान लेती हैं, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवाधिकारों का हनन होता है। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश की ये घटनाएं साबित करती हैं कि वन क्षेत्रों में जवाबदेही की भारी कमी है।
"जब पुलिस रिपोर्टों में विरोधाभास होता है और गवाह डर के मारे सामने नहीं आते, तो वह मुठभेड़ नहीं, बल्कि एक सुनियोजित हत्या बन जाती है।"
उस समय तमिलनाडु में एआईएडीएमके (AIADMK) की सरकार थी। पूर्व मुख्यमंत्री जे. जयललिता ने इस घटना पर गहरी चिंता व्यक्त की थी और टास्क फोर्स की 'आत्मरक्षा' वाली थ्योरी पर संदेह जताया था। उन्होंने सवाल किया था कि क्या बल का प्रयोग वास्तव में आवश्यक था या यह एक अनावश्यक हिंसा थी। उन्होंने मृतकों के परिवारों को 2 लाख रुपये की सहायता राशि भी प्रदान की थी।
मानवाधिकार संगठनों, विशेष रूप से 'पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज' (PUCL) ने FIR की जांच की और पाया कि इसमें दर्ज विवरण पूरी तरह से कृत्रिम और विरोधाभासी थे। कई रिश्तेदारों ने डर के मारे शवों को लेने से भी मना कर दिया था, क्योंकि उन्हें डर था कि उन्हें जांच के नाम पर प्रताड़ित किया जाएगा।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: शेषचलम मुठभेड़ 2015 में क्यों हुई थी?
आंध्र प्रदेश पुलिस का दावा था कि लाल चंदन की तस्करी रोकने के लिए चलाए गए अभियान के दौरान लकड़हारों ने उन पर हमला किया, जिसके जवाब में फायरिंग की गई।
प्रश्न 2: इस घटना पर तमिलनाडु सरकार की क्या प्रतिक्रिया थी?
तत्कालीन मुख्यमंत्री जे. जयललिता ने पुलिस की कार्रवाई पर संदेह जताया और इसे मानवाधिकारों का उल्लंघन मानते हुए पीड़ितों के परिवारों को मुआवजा दिया।