कर्नाटक की हक्की पिक्की जनजाति के नौ सदस्य, जिन्हें आइवरी कोस्ट में अवैध रूप से हर्बल तेल बेचने के आरोप में हिरासत में लिया गया था, अब रिहा कर दिए गए हैं। मैसूर जिले के रहने वाले ये लोग अपनी पारंपरिक आजीविका के लिए अंतरराष्ट्रीय जोखिम उठा रहे हैं।

  • हर्बल तेल की अवैध बिक्री के आरोप में आइवरी कोस्ट में हिरासत में लिए गए हक्की पिक्की जनजाति के 9 सदस्य रिहा।
  • सभी सदस्य कर्नाटक के मैसूर जिले के हुनसूर तालुक के पक्सिराजुपुरा गांव के निवासी हैं।
  • हक्की पिक्की समुदाय पारंपरिक औषधियों के माध्यम से उच्च लाभ कमाने के लिए अक्सर अफ्रीकी देशों की यात्रा करता है।

कर्नाटक के एक अर्ध-खानाबदोश आदिवासी समुदाय के लिए बड़ी राहत की खबर आई है। आइवरी कोस्ट में अवैध रूप से हर्बल तेल बेचने के आरोप में हिरासत में लिए गए नौ लोगों को रिहा कर दिया गया है। इन लोगों को 29 जुलाई को अबिडजान से लगभग 200 किमी दूर अबेंगौरू में गिरफ्तार किया गया था।

रिहा किए गए सदस्यों में से एक, 36 वर्षीय निरवेणी ने फोन पर बताया कि उन्हें 12 अगस्त को रिहा कर दिया गया। हालांकि, उन्होंने कहा कि वे फिलहाल भारत लौटने की योजना नहीं बना रहे हैं क्योंकि अभी तक उनका व्यवसाय उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा है। निरवेणी के अनुसार, उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए आइवरी कोस्ट में हर्बल तेल का प्रचार कर उसे बेचने की योजना बनाई थी, लेकिन कानूनी अड़चनों के कारण उन्हें जेल जाना पड़ा।

इस समूह में प्रभुदेव, शाहजान, शांति, गिरीश, लक्ष्मी, पप्पू पी, पापा और सिमरन शामिल हैं, जो सभी मैसूर जिले के हुनसूर तालुक के पक्सिराजुपुरा के निवासी हैं। यह घटना दर्शाती है कि आर्थिक तंगी और बेहतर भविष्य की तलाश में यह समुदाय किस तरह अनजान देशों में जोखिम उठाता है।

यह क्यों महत्वपूर्ण है?

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि हक्की पिक्की समुदाय का पारंपरिक पक्षी-पकड़ने के काम से हटकर अंतरराष्ट्रीय हर्बल व्यापार की ओर बढ़ना एक अस्तित्व बचाने की रणनीति है। वे अफ्रीकी बाजारों में अपने निवेश पर 200 प्रतिशत तक के लाभ की उम्मीद करते हैं, भले ही उन्हें वहां की कानूनी प्रक्रियाओं या राजनयिक सुरक्षा की जानकारी न हो।

हक्की पिक्की जनजाति का अफ्रीका प्रवास केवल यात्रा नहीं है, बल्कि वैश्विक बाजार में अपने पैतृक वानस्पतिक ज्ञान का उपयोग कर गरीबी से लड़ने का एक हताश प्रयास है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: हक्की पिक्की जनजाति

हक्की पिक्की (कन्नड़ में 'हक्की' का अर्थ पक्षी और 'पिक्की' का अर्थ पकड़ने वाला) पारंपरिक रूप से पक्षी पकड़ने और शिकार करने वाला एक अर्ध-खानाबदोश समुदाय है। 1950 के दशक में वन्यजीव संरक्षण कानूनों के कारण शिकार पर प्रतिबंध लगने के बाद, यह समुदाय जंगलों से विस्थापित हो गया और उन्होंने पौधों के अपने पारंपरिक ज्ञान का उपयोग करना शुरू किया।

2011 की जनगणना के अनुसार, कर्नाटक में लगभग 11,892 हक्की पिक्की लोग हैं, जो मुख्य रूप से दावणगेरे, मैसूर, कोलार, हसन और शिवमोगा जिलों में केंद्रित हैं। यह समुदाय अपनी जीविका के लिए दशकों से अन्य देशों की यात्रा कर रहा है—पहले हस्तशिल्प बेचने के लिए और अब पारंपरिक हर्बल तेलों और दवाओं के लिए।

क्या आप जानते हैं?: हक्की पिक्की लोग 'वाघरी' नामक एक आदिवासी भाषा बोलते हैं, साथ ही वे कन्नड़ और हिंदी में भी निपुण होते हैं, जो उनकी अंतरराष्ट्रीय यात्राओं में मददगार साबित होता है।

आदिवासी प्रवास: जोखिम बनाम लाभ

कारकसंभावित लाभसंबंधित जोखिम
वित्तीय200% तक का मुनाफापूंजी का पूर्ण नुकसान
कानूनीबाजार का विस्तारगिरफ्तारी/देशनिकाला
सुरक्षावैश्विक अनुभवयुद्धग्रस्त क्षेत्र (जैसे सूडान)

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न: हक्की पिक्की विशेष रूप से अफ्रीका की यात्रा क्यों करते हैं?
उत्तर: उनका मानना है कि अफ्रीकी देशों में पारंपरिक हर्बल तेलों की मांग अधिक है, जिससे उन्हें घरेलू भारतीय बाजारों की तुलना में बहुत अधिक लाभ मिलता है।

प्रश्न: सूडान में फंसे आदिवासियों का क्या हुआ था?
उत्तर: अप्रैल 2023 में, इस समुदाय के 31 सदस्य सूडान के संघर्ष में फंस गए थे, जिन्हें बाद में भारतीय विदेश मंत्रालय के हस्तक्षेप से सुरक्षित बचाया गया था।