मंगलुरु की एक अदालत ने नगर निगम (MCC) अधिकारियों के साथ दुर्व्यवहार के आरोप में फंसे स्ट्रीट वेंडर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष और एक महिला विक्रेता को अग्रिम जमानत दे दी है। यह मामला जुलाई में चलाए गए अतिक्रमण हटाओ अभियान से जुड़ा है।
- मंगलुरु कोर्ट ने बी.के. इम्तियाज और शांता को अग्रिम जमानत दी।
- आरोप: MCC अधिकारियों के साथ दुर्व्यवहार और सरकारी कार्य में बाधा डालना।
- अदालत ने माना कि आरोपी आदतन अपराधी नहीं हैं और अपराध गंभीर प्रकृति के नहीं हैं।
मंगलुरु की एक स्थानीय अदालत ने स्ट्रीट वेंडर्स एसोसिएशन के जिला अध्यक्ष बी.के. इम्तियाज और स्ट्रीट वेंडर शांता को बड़ी राहत देते हुए अग्रिम जमानत प्रदान की है। इन दोनों पर मंगलुरु सिटी कॉर्पोरेशन (MCC) के अधिकारियों के साथ दुर्व्यवहार और उनके काम में बाधा डालने का आरोप था।
यह पूरा विवाद 26 जुलाई को शुरू हुआ था, जब MCC ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और नगर निगम आयुक्त के निर्देशों के तहत शहर में स्ट्रीट वेंडर्स के खिलाफ एक विशेष सफाई अभियान चलाया था। इस अभियान का उद्देश्य सड़कों से अवैध अतिक्रमण को हटाना था।
मंगलुरु साउथ पुलिस स्टेशन में दर्ज शिकायत के अनुसार, जोनल कमिश्नर भारती ने आरोप लगाया कि अभियान के दौरान शांता और इम्तियाज ने अन्य विक्रेताओं को उकसाया कि वे अभियान में लगे वाहनों पर चढ़ जाएं और कर्मियों पर हमला करें। जब कमिश्नर भारती और स्वास्थ्य निरीक्षक दीपिका शालिनी डिसूजा ने हस्तक्षेप किया, तो आरोपियों ने कथित तौर पर उनके साथ गाली-गलौज की और शारीरिक हमले का प्रयास किया।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला शहरी प्रशासन और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था (Informal Economy) के बीच बढ़ते तनाव को दर्शाता है। जब नगर निगम सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को लागू करता है, तो अक्सर जमीनी स्तर पर विक्रेताओं के साथ टकराव होता है, जो कानूनी लड़ाई में बदल जाता है। यह घटना दिखाती है कि कैसे प्रशासनिक कार्रवाई और मानवाधिकारों के बीच संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती है।
"नगर निगमों को अतिक्रमण हटाने के लिए कानूनी शक्ति प्राप्त है, लेकिन विक्रेताओं के पुनर्वास की कमी अक्सर इस तरह के हिंसक टकरावों को जन्म देती है।"
इस मामले में आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं 132, 115(2), 352 और 49 (धारा 3(5) के साथ पठित) के तहत मामला दर्ज किया गया था। आरोपियों ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 482 के तहत अग्रिम जमानत के लिए याचिका दायर की थी।
प्रधान जिला और सत्र न्यायाधीश बसवराज ने 14 अगस्त को फैसला सुनाते हुए कहा कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि याचिकाकर्ता आदतन अपराधी हैं। अदालत ने यह भी नोट किया कि आरोप गंभीर प्रकृति के नहीं हैं और पुलिस को आगे की जांच के लिए उनकी हिरासत की आवश्यकता नहीं है।
न्यायाधीश ने निर्देश दिया कि यदि गिरफ्तारी होती है, तो पुलिस उन्हें 75,000 रुपये के व्यक्तिगत बॉन्ड और एक जमानतदार के आधार पर रिहा कर दे। साथ ही, अदालत ने उन्हें गवाहों को प्रभावित न करने और भविष्य में इस तरह के अपराध न करने की सख्त हिदायत दी है।
Frequently Asked Questions
1. आरोपियों पर कौन सी कानूनी धाराएं लगाई गई थीं?
उन पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 132, 115(2), 352 और 49 के तहत मामला दर्ज किया गया था।
कोर्ट ने पाया कि आरोपी आदतन अपराधी नहीं थे और उनके द्वारा किए गए कथित अपराध गंभीर प्रकृति के नहीं थे।