सुप्रीम कोर्ट ने राम मंदिर ट्रस्ट के दान में कथित गबन मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए कहा है कि वर्तमान में जांच SIT के पास है। कोर्ट ने सुझाव देने वालों को सॉलिसिटर जनरल के कार्यालय से संपर्क करने की सलाह दी है।
- सुप्रीम कोर्ट ने राम मंदिर दान गबन मामले की जांच SIT को सौंपे रखने का फैसला किया।
- CJI सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि यदि SIT संतोषजनक काम नहीं करेगी, तभी कोर्ट हस्तक्षेप करेगा।
- किसी भी नए सुझाव या साक्ष्य को सॉलिसिटर जनरल के कार्यालय में जमा किया जा सकता है।
- निर्मोही अखाड़ा ने ट्रस्ट को 'पब्लिक ट्रस्ट' में बदलने की मांग की है।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (17 अगस्त, 2026) को श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के फंड में कथित हेराफेरी के मामले में एक महत्वपूर्ण रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने स्पष्ट किया कि अदालत फिलहाल जांच में हस्तक्षेप नहीं करेगी और यह उम्मीद करती है कि विशेष जांच दल (SIT) इस मामले को तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाएगा।
सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि उन्हें प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) की सामग्री तक नहीं दिखाई गई है और दान से संबंधित डेटा को सार्वजनिक किया जाना चाहिए। इस पर उत्तर प्रदेश राज्य की ओर से पेश वकील श्री मेहता ने आश्वासन दिया कि दान का रखरखाव सही ढंग से किया जा रहा है। कोर्ट ने कहा कि कोई भी व्यक्ति जिसे लगता है कि जांच के किसी पहलू की अनदेखी की गई है, वह सॉलिसिटर जनरल के कार्यालय में अपने सुझाव दे सकता है, जिन्हें वस्तुनिष्ठ तरीके से SIT तक पहुंचाया जाएगा।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह मामला केवल वित्तीय अनियमितता का नहीं है, बल्कि करोड़ों भक्तों की आस्था और विश्वास से जुड़ा है। जब किसी देश के सबसे प्रतिष्ठित धार्मिक संस्थान में गबन के आरोप लगते हैं, तो यह सार्वजनिक विश्वास के लिए एक बड़ी चुनौती बन जाता है। सुप्रीम कोर्ट का 'हैंड्स-ऑफ' दृष्टिकोण यह दर्शाता है कि वह पहले प्रशासनिक और पुलिस तंत्र को अपनी क्षमता साबित करने का मौका देना चाहता है, लेकिन साथ ही एक निगरानी तंत्र (SIT) को सक्रिय रखा है।
"धार्मिक ट्रस्टों में पारदर्शिता की कमी अक्सर कानूनी विवादों को जन्म देती है; इस मामले में फोरेंसिक ऑडिट ही अंतिम सत्य सामने ला सकता है।"
मामले की गंभीरता को देखते हुए, उत्तर प्रदेश सरकार ने किरण एस. (IGP, लखनऊ रेंज) की अध्यक्षता में SIT का गठन किया है, जिसमें अयोध्या और बाराबंकी के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी शामिल हैं। साथ ही, फंड के गबन के आरोपों की प्रकृति को देखते हुए एक फोरेंसिक ऑडिटर को भी टीम में शामिल किया गया है।
दूसरी ओर, निर्मोही अखाड़ा ने अदालत से आग्रह किया कि ट्रस्ट को एक सार्वजनिक ट्रस्ट (Public Trust) में पुनर्गठित किया जाए ताकि जवाबदेही तय हो सके। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वर्तमान सुनवाई केवल गबन की जांच तक सीमित है और अखाड़ा इस मुद्दे को अलग से उठा सकता है। आरजेडी सांसद सुधाकर सिंह ने भी मांग की है कि ट्रस्ट अपनी स्थापना से अब तक के सभी नकद, डिजिटल और विदेशी योगदान का पूरा विवरण सार्वजनिक करे।
Frequently Asked Questions
1. राम मंदिर दान मामले में SIT का गठन किसने किया?
उत्तर प्रदेश सरकार ने 25 जुलाई, 2026 को एक कार्यालय ज्ञापन के माध्यम से IGP किरण एस. की अध्यक्षता में SIT का गठन किया।
2. याचिकाकर्ताओं की मुख्य मांग क्या है?
मुख्य मांगों में CBI जांच, सभी वित्तीय विवरणों (विदेशी योगदान सहित) का प्रकाशन और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों (CCTV) का संरक्षण शामिल है।