सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर प्रशासन को निर्देश दिया है कि वह 1953 से पुलिस स्टेशन के रूप में उपयोग की जा रही निजी जमीन का किराया अब्दुल रशीद वानी को भुगतान करे।

  • SC ने 7 कनाल और 18 मरला जमीन के लिए 1953 से किराया देने का आदेश दिया।
  • भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया 2021 से शुरू होगी, 1953 से नहीं।
  • हाई कोर्ट द्वारा 68 साल की देरी के आधार पर याचिका खारिज करने के फैसले को बदला गया।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने संपत्ति अधिकारों और राज्य की जवाबदेही से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में जम्मू-कश्मीर प्रशासन को आदेश दिया है कि वह अब्दुल रशीद वानी को उनकी पारिवारिक जमीन के अनधिकृत उपयोग के लिए मुआवजा दे। गांदरबल के कंगन में स्थित इस जमीन का उपयोग 1953 से पुलिस स्टेशन के रूप में किया जा रहा था, लेकिन इसके लिए न तो कोई औपचारिक अधिग्रहण प्रक्रिया अपनाई गई और न ही मुआवजे का भुगतान किया गया।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने मामले की समीक्षा करते हुए कहा कि राज्य बिना भुगतान के निजी जमीन पर कब्जा नहीं कर सकता। अदालत ने भूमि अधिग्रहण अधिकारी को निर्देश दिया है कि वह 7 कनाल और 18 मरला जमीन के लिए 1953 से किराए की गणना करे।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

BozokMedia का विश्लेषण बताता है कि यह फैसला इस सिद्धांत को मजबूत करता है कि राज्य की 'एमिनेंट डोमेन' (eminent domain) शक्ति पूर्ण नहीं है और इसे कानूनी चैनलों के माध्यम से ही लागू किया जाना चाहिए। सात दशकों की अवधि के लिए किराए का आदेश देकर, अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि प्रशासनिक लापरवाही या कागजी कार्रवाई की कमी सरकार को निजी संपत्ति पर मुफ्त कब्जा करने का अधिकार नहीं देती।

"राज्य अपनी कानूनी प्रक्रियाओं की विफलता का लाभ नहीं उठा सकता, चाहे कितना भी समय क्यों न बीत गया हो।"

यह मामला तब जटिल हो गया जब जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने वानी की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि 68 साल की देरी के बाद यह मामला अब 'मृत' हो चुका है। हाई कोर्ट ने वानी के इस तर्क को भी खारिज कर दिया था कि उनके पिता अनपढ़ थे, इसलिए वे पहले अदालत नहीं जा सके।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने किराए का आदेश दिया, लेकिन अत्यधिक देरी का हवाला देते हुए 1953 से पूर्वव्यापी अधिग्रहण (retrospective acquisition) का आदेश देने से इनकार कर दिया। इसके बजाय, अदालत ने निर्देश दिया कि अधिग्रहण की प्रक्रिया 2021 से शुरू की जाए, जब वानी ने पहली बार हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। अंतिम मुआवजे और कुल किराए की राशि का निर्धारण हाई कोर्ट करेगा।

केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन ने याचिका का विरोध करते हुए तर्क दिया कि पुलिस विभाग 1953 से जमीन पर शांतिपूर्वक काबिज है और इतने दशकों बाद आधिकारिक रिकॉर्ड पेश करना कठिन होगा। वहीं, वानी ने दावा किया कि 2014 की बाढ़ के दौरान उनके दस्तावेज़ नष्ट हो गए थे।

क्या आप जानते हैं?: भारतीय कानून में 'एमिनेंट डोमेन' सरकार की वह शक्ति है जिसके तहत वह सार्वजनिक उपयोग के लिए निजी संपत्ति ले सकती है, बशर्ते वह उचित प्रक्रिया का पालन करे और उचित मुआवजा दे।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. हाई कोर्ट ने शुरू में याचिका क्यों खारिज की थी?
हाई कोर्ट ने इसे 68 साल की लंबी और बिना स्पष्टीकरण वाली देरी के कारण खारिज कर दिया था।

2. क्या सरकार 1953 से जमीन का अधिग्रहण करेगी?
नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने अधिग्रहण प्रक्रिया 2021 से शुरू करने का निर्देश दिया है, लेकिन किराया 1953 से देना होगा।