दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामे के जरिए स्वीकार किया है कि नीट-यूजी पेपर लीक विरोध प्रदर्शनों के दौरान फेशियल रिकग्निशन सिस्टम (FRS) का उपयोग किया गया था। पुलिस ने इसे कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए एक 'वैध और आनुपातिक' कदम बताया है।
- दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में स्वीकार किया कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान फेशियल रिकग्निशन तकनीक का उपयोग किया गया।
- पुलिस का दावा है कि FRS का उपयोग केवल गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड वाले व्यक्तियों की पहचान के लिए किया गया, न कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के लिए।
- FRS के माध्यम से 2,873 ऐसे व्यक्तियों की पहचान की गई जिनका गंभीर आपराधिक इतिहास था।
- पुलिस ने 'नेल लाठी' के उपयोग और महिला प्रदर्शनकारियों के साथ दुर्व्यवहार के आरोपों से इनकार किया है।
नई दिल्ली: नीट-यूजी पेपर लीक मामले में हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद उपजे विवाद में दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखा है। पुलिस ने स्पष्ट किया है कि प्रदर्शनकारियों की भीड़ को नियंत्रित करने और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए फेशियल रिकग्निशन सिस्टम (FRS) का उपयोग किया गया था, जो कि 'वैध राज्य हित' (Legitimate State Interest) के दायरे में आता है।
हलफनामे में पुलिस ने उन दावों को खारिज कर दिया कि इस तकनीक का उपयोग आम नागरिकों की जासूसी करने या उनके निजी डेटा को बेचने के लिए किया गया। पुलिस के अनुसार, यह प्रणाली स्वचालित रूप से हर व्यक्ति की प्रोफाइल नहीं बनाती है। इसके बजाय, इसका उपयोग केवल उन लोगों की पहचान करने के लिए किया गया जिनके पास पहले से गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड थे। पुलिस ने डेटा साझा किया कि FRS ने 2,873 ऐसे व्यक्तियों को चिन्हित किया जिनके आपराधिक रिकॉर्ड थे, जिनमें से 92 लोग ऐसे थे जो 10 से अधिक मामलों में शामिल थे।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows that this case highlights the growing tension between state security apparatus and the right to privacy in India. The deployment of AI-powered surveillance during democratic protests sets a critical precedent for how technology will be used to monitor public dissent in the future. The court's decision on whether 'state interest' overrides individual privacy will be a landmark for digital rights.
"The use of facial recognition in public protests transforms the nature of surveillance from targeted investigation to mass screening, potentially chilling the spirit of free speech."
पुलिस ने प्रदर्शन के दौरान बल प्रयोग के आरोपों पर भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि आंसू गैस के गोले और लाठीचार्ज का उपयोग केवल अंतिम विकल्प के रूप में और पूरी तरह से कानून के दायरे में किया गया था। पुलिस ने 'नेल लाठी' (कीलों वाली लाठी) के उपयोग के वीडियो को भ्रामक बताया और कहा कि वह वास्तव में एक डंडा था जिस पर राष्ट्रीय ध्वज लगा हुआ था।
ऐतिहासिक संदर्भ की बात करें तो, यह विरोध प्रदर्शन 6 जून को शुरू हुआ था। पुलिस के अनुसार, शुरुआत में 'कॉकरोच जनता पार्टी' के सदस्य सौरव दास ने 500-600 लोगों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति मांगी थी, जिसे एक विशेष छूट के रूप में दिया गया था। हालांकि, समय बीतने के साथ प्रदर्शनकारियों की संख्या में भारी वृद्धि हुई और 20 जुलाई को बिना अनुमति के 'संसद चलो' मार्च निकाला गया, जिसने हिंसक रूप ले लिया।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: क्या दिल्ली पुलिस ने सभी प्रदर्शनकारियों का डेटा एकत्र किया?
नहीं, पुलिस के अनुसार FRS का उपयोग केवल उन लोगों के लिए किया गया जिनका गंभीर आपराधिक इतिहास था, शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के लिए नहीं।
दिल्ली पुलिस ने हलफनामे में इस बात से पूरी तरह इनकार किया है और इसे गलत नैरेटिव बताया है।