दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में एक विस्तृत हलफनामा दायर किया है जिसमें हिंसा के आंकड़ों का विवरण है, लेकिन महिला प्रदर्शनकारियों के साथ कथित दुर्व्यवहार पर जवाबदेही तय करने में पुलिस मौन है।

  • दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में 42 पन्नों का विस्तृत हलफनामा पेश किया।
  • 20 जुलाई की हिंसा में 240 से अधिक पुलिसकर्मी और 218 प्रदर्शनकारी घायल हुए।
  • महिला प्रदर्शनकारियों के साथ दुर्व्यवहार के आरोपों पर पुलिस ने जवाबदेही तय करने से परहेज किया।
  • सुप्रीम कोर्ट ने यौन उत्पीड़न के आरोपों की जांच के लिए उच्च स्तरीय समिति का प्रस्ताव दिया है।

नई दिल्ली: दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण हलफनामा दायर किया है, जो संख्यात्मक आंकड़ों से तो भरा हुआ है, लेकिन घटना के दौरान पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के मामले में बेहद अस्पष्ट है। यह हलफनामा NEET-UG प्रदर्शनकारियों के आंदोलन के दौरान हुई हिंसा और कानून-व्यवस्था की स्थिति पर केंद्रित है।

आंकड़ों का खेल और सुरक्षा का दावा

पुलिस द्वारा प्रस्तुत 42 पन्नों के दस्तावेज़ के अनुसार, 20 जुलाई की हिंसा के दौरान स्थिति काफी गंभीर थी। हलफनामे में बताया गया है कि एक समय पर 30,000 से अधिक प्रदर्शनकारी थे, जिनका सामना केवल 5,000 वर्दीधारी पुलिस अधिकारियों से हो रहा था। सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए 3,600 से अधिक बैरिकेड्स का उपयोग किया गया और 4,600 से अधिक महिला पुलिस कर्मियों को तैनात किया गया था।

पुलिस का दावा है कि प्रदर्शन के दौरान अराजक तत्वों ने घुसपैठ की, जिसके परिणामस्वरूप 7 वाहन चोरी हुए और 66 अन्य चोरियां हुईं। पुलिस ने यह भी बताया कि चेहरे की पहचान करने वाली प्रणाली (Facial Recognition System) ने 2,873 चेहरों की पहचान की जो उनके डेटाबेस से मेल खाते थे।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला केवल कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों और पुलिस की कार्यप्रणाली की पारदर्शिता का है। जब पुलिस बल का उपयोग प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है, तो 'अनुपातिकता' (proportionality) का सिद्धांत सर्वोपरि होना चाहिए।

पुलिस द्वारा आंकड़ों का उपयोग सुरक्षा व्यवस्था को justifying करने के लिए किया जा रहा है, लेकिन जवाबदेही की कमी न्यायिक जांच को और गहरा कर सकती है।

हालांकि, हलफनामा उन गंभीर आरोपों पर चुप्पी साधे हुए है जिनमें पुलिसकर्मियों द्वारा महिला प्रदर्शनकारियों के साथ बदसलूकी और यौन उत्पीड़न के दावे किए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्याकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने आश्वासन दिया है कि आरोपों की जांच के लिए एक उच्च स्तरीय समिति बनाई जा सकती है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

यह विरोध प्रदर्शन जून 2026 में शुरू हुआ था, जो धीरे-धीरे बड़े पैमाने पर आंदोलन में बदल गया। 20 जुलाई को 'संसद चलो' मार्च के दौरान स्थिति तब अनियंत्रित हो गई जब प्रदर्शनकारियों ने संसद और राष्ट्रपति भवन जैसे महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की ओर बढ़ने का प्रयास किया। पुलिस का कहना है कि इस दौरान पुलिसकर्मियों पर 'मॉब लिंचिंग' के अंदाज में हमला किया गया था।

Did You Know?: दिल्ली पुलिस ने इस विरोध के दौरान सुरक्षा के लिए 3,600 से अधिक बैरिकेड्स का उपयोग किया था।

Frequently Asked Questions

1. सुप्रीम कोर्ट ने महिला प्रदर्शनकारियों के साथ दुर्व्यवहार के आरोपों पर क्या कहा?
न्यायालय ने आरोपों की जांच के लिए एक उच्च स्तरीय समिति बनाने पर विचार किया है, जिसकी रिपोर्ट के आधार पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

2. पुलिस के अनुसार हिंसा का मुख्य कारण क्या था?
पुलिस का दावा है कि प्रदर्शनकारियों के एक समूह ने संसद और अन्य महत्वपूर्ण सरकारी प्रतिष्ठानों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की, जिससे कानून-व्यवस्था बिगड़ गई।