केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई त्रिपक्षीय बैठक के बाद, केंद्र सरकार ने दार्जिलिंग की पहाड़ियों में गोरखा पहचान और राजनीतिक समाधान के लिए एक विशेष समिति गठित की है।
- अमित शाह ने दार्जिलिंग की पहाड़ियों के लिए स्थायी राजनीतिक समाधान का आश्वासन दिया।
- पूर्व उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार पंकज कुमार सिंह समिति का नेतृत्व करेंगे।
- समाधान पूरी तरह से भारतीय संविधान के ढांचे के भीतर होगा।
- समिति समझौते के मसौदे और कार्यान्वयन की रूपरेखा तैयार करेगी।
पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग और आसपास के क्षेत्रों में दशकों से चले आ रहे गोरखालैंड मुद्दे को सुलझाने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक निर्णायक कदम उठाया है। शनिवार को सुकना में आयोजित एक महत्वपूर्ण त्रिपक्षीय बैठक के बाद, गृह मंत्रालय ने एक विशेष समिति के गठन की घोषणा की है। इस समिति का मुख्य उद्देश्य गोरखा पहचान और क्षेत्र के लिए एक स्थायी राजनीतिक समाधान हेतु समझौते का मसौदा तैयार करना है।
सुकना में ऐतिहासिक बैठक
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दार्जिलिंग की तलहटी में स्थित सुकना में गोरखा नेताओं और पश्चिम बंगाल सरकार के प्रतिनिधियों के साथ गहन चर्चा की। इस बैठक में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (GJM) के प्रमुख बिमल गुरुंग, गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (GNLF) के प्रमुख मान घिसिंग और भाजपा सांसद राजू बिस्ता सहित कई महत्वपूर्ण नेता शामिल हुए। बैठक का मुख्य केंद्र दार्जिलिंग की पहाड़ियों की विशिष्ट पहचान और संवैधानिक अधिकारों को मान्यता देना था।
केंद्र सरकार का यह कदम दार्जिलिंग के राजनीतिक परिदृश्य को बदलने की क्षमता रखता है, बशर्ते यह संवैधानिक सीमाओं के भीतर रहे।
पंकज कुमार सिंह के नेतृत्व में नई पहल
समझौते की बारीकियों को तय करने के लिए केंद्र ने पंकज कुमार सिंह की अध्यक्षता में एक समिति नियुक्त की है। सिंह, जो एक सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी और पूर्व उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हैं, अक्टूबर 2025 से इस क्षेत्र के मध्यस्थ (Interlocutor) के रूप में कार्यरत हैं। BozokMedia विश्लेषण दिखाता है कि सिंह का अनुभव इस जटिल भू-राजनीतिक मुद्दे को सुलझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
Why This Matters
यह मुद्दा केवल क्षेत्रीय स्वायत्तता का नहीं, बल्कि पहचान और सुरक्षा का भी है। दशकों से चले आ रहे आंदोलनों में भारी जनहानि हुई है। केंद्र का यह प्रयास न केवल शांति स्थापित करने के लिए है, बल्कि क्षेत्र में विकास के लिए आवश्यक केंद्रीय फंडिंग सुनिश्चित करने के लिए भी महत्वपूर्ण है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
गोरखालैंड की मांग दशकों पुरानी है। 1988 के गोरखा समझौते के बाद दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल का गठन किया गया था, लेकिन यह मांगें पूरी तरह शांत नहीं हुईं। पिछले आंदोलनों के दौरान लगभग 2,000 लोगों की जान गई और हजारों लोग विस्थापित हुए। केंद्र ने हाल ही में पश्चिम बंगाल में सरकार बनने के बाद इस मुद्दे को छह महीने के भीतर सुलझाने का वादा किया था।
Frequently Asked Questions
1. यह समिति किसके नेतृत्व में काम करेगी?
यह समिति पूर्व उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार पंकज कुमार सिंह के नेतृत्व में काम करेगी।
2. क्या यह समझौता एक नया राज्य बना देगा?
गृह मंत्रालय के अनुसार, कोई भी समाधान भारतीय संविधान के ढांचे के भीतर ही होगा।