बिहार में फरक्का जल संधि के नवीकरण को लेकर राजद और जडयू के बीच तीखी सियासी लड़ाई छिड़ गई है। दोनों पार्टियों ने लाला प्रसाद और केंद्र सरकार पर अलग‑अलग आरोप लगाए हैं, जबकि किसान और जल संसाधन हितधारक इस विवाद से सीधे प्रभावित हैं।
- 2026 में समाप्त होने वाली फरक्का जल संधि के नवीकरण को लेकर राजद‑जडयू में तीखा टकराव।
- राष्ट्रवादी गठबंधन (जडयू) ने लाला प्रसाद को संधि की विफलता के लिए जिम्मेदार ठहराया।
- राजद ने जडयू के नेताओं को सार्वजनिक को गुमराह करने का आरोप लगाया और बिहार को साझेदार बनाने की मांग की।
बिहार की राजनीति इस महीने फरक्का जल संधि के नवीकरण को लेकर गरम हो गई है। वर्तमान में भारत‑बांग्लादेश के बीच इस समझौते की अवधि दिसंबर 2026 में समाप्त हो रही है, और दोनों पक्षों के बीच नई शर्तों पर चर्चा शुरू हो चुकी है। इस संदर्भ में राज्य‑स्तर की दो प्रमुख पार्टियों—राष्ट्रवादी जनतांत्रिक यूनियन (जडयू) और राष्ट्रवादी जनता दल (राजद)—के बीच तीखी सियासी टकराव देखी जा रही है।
जडयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद ने कहा कि "फरक्का संधि लाला प्रसाद की नाकामी है" और यह दावा किया कि लाला ने 1996 में हुई संधि के दौरान अपने राजनीतिक डर—जैसे जेल की संभावना—के कारण विरोध नहीं किया। वहीं, राजद के उपमुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी ने इस बात को उजागर किया कि लाला के समय में बिहार के हितों की पूरी तरह अनदेखी की गई थी।
राजद सांसद सुधाकर सिंह ने जडयू के नेताओं पर सार्वजनिक को गुमराह करने का आरोप लगाया और कहा कि "लालू और जगदानंद ने हमेशा इस संधि के दुष्परिणामों की चेतावनी दी है"। उन्होंने यह भी कहा कि बिहार को इस नई समीक्षा बैठक में "हिस्सेदार" बनाना चाहिए, ताकि जल प्रवाह, मिट्टी क्षरण और बाढ़ जैसी समस्याओं का समाधान हो सके।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
फरक्का जल संधि पहली बार 1996 में भारत और बांग्लादेश के बीच हस्ताक्षरित हुई थी, जब लाला प्रसाद बिहार के मुख्यमंत्री और केन्द्र में समर्थित सरकार के प्रमुख थे। तब संधि में बांग्लादेश को गंगा‑बरसाव नदी का एक हिस्सा बाँटने की अनुमति दी गई थी, जिससे बिहार के जल संसाधन पर गहरा प्रभाव पड़ा। वर्षों में कई बार इस संधि की वैधता और प्रभाव पर प्रश्न उठते रहे हैं, विशेषकर बाढ़, जल प्रवाह में कमी और कृषि उत्पादन पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को लेकर।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows that the Farakka treaty debate is not merely a regional water‑sharing issue; it has become a litmus test for political credibility ahead of the next state elections. The way parties position themselves on this matter could reshape voter alliances in Bihar’s agrarian heartland.
"Farakka’s future hinges on a balanced approach that respects both upstream and downstream needs, something Indian politics has historically struggled to achieve," says water‑policy expert Dr. Ananya Sharma.
Frequently Asked Questions
Q1: क्या फरक्का जल संधि का नवीकरण बिहार की जल सुरक्षा को खतरे में डाल सकता है?
A1: विशेषज्ञों का मानना है कि अगर नई शर्तें बिना राज्य की सहमति के तय की गईं तो बिहार की जल आपूर्ति और कृषि पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
Q2: सरकार कब नई संधि पर चर्चा करेगी?
A2: केंद्र ने कहा है कि 2025 के अंत तक सभी पक्षों के साथ विस्तृत परामर्श किया जाएगा, जिससे दिसंबर 2026 से पहले अंतिम निर्णय लिया जा सके।