तमिलनाडु सरकार द्वारा ₹27,400 करोड़ की परंदूर हवाई अड्डा परियोजना को रद्द करने के फैसले के बाद, अब सबसे बड़ा सवाल अधिग्रहित की गई भूमि के भविष्य को लेकर है। जानें क्या कानून सरकार को जमीन वापस करने की अनुमति देता है।
- तमिलनाडु सरकार ने ₹27,400 करोड़ की परंदूर ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट परियोजना को आधिकारिक रूप से रद्द कर दिया है।
- कुल 5,846 एकड़ भूमि की आवश्यकता थी, जिसमें से 1,802 एकड़ निजी भूमि का अधिग्रहण किया जा चुका है।
- 2013 के भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत, सरकार के पास भूमि वापस करने या अन्य सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए उपयोग करने के विकल्प मौजूद हैं।
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय द्वारा सोमवार को परंदूर ग्रीनफील्ड हवाई अड्डा परियोजना को छोड़ने की घोषणा के बाद, राज्य में राजनीतिक और सामाजिक हलचल तेज हो गई है। कांचीपुरम जिले में प्रस्तावित इस ₹27,400 करोड़ के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट को रद्द करने का निर्णय किसानों और स्थानीय निवासियों के लंबे संघर्ष का परिणाम माना जा रहा है।
परंदूर हवाई अड्डे के विरोध का मुख्य कारण पर्यावरण और आजीविका से जुड़ी चिंताएं थीं। स्थानीय किसानों का तर्क था कि प्रस्तावित स्थल जल निकायों से भरा हुआ है, जिससे पारिस्थितिक तंत्र को भारी नुकसान होगा। मुख्यमंत्री विजय, जो अपनी राजनीतिक यात्रा के दौरान इन विरोध प्रदर्शनों के साथ खड़े रहे थे, ने सत्ता में आने के बाद इस परियोजना को समाप्त करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया।
अधिग्रहित भूमि का कानूनी गणित
कानून और ऊर्जा संसाधन मंत्री सी.टी.आर. निर्मल कुमार के अनुसार, इस परियोजना के लिए कुल 5,846 एकड़ भूमि की आवश्यकता थी। इसमें से 1,972 एकड़ सरकारी भूमि थी, जिसमें 1,558 एकड़ जल निकाय शामिल थे। निजी 'पट्टा' भूमि के मामले में, 3,874 एकड़ में से लगभग 1,802 एकड़ का अधिग्रहण किया जा चुका है।
भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया के बीच में सरकार का निर्णय लेना एक जटिल कानूनी स्थिति पैदा करता है, जहाँ मुआवजे और स्वामित्व के बीच संतुलन बनाना अनिवार्य है।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण दर्शाता है कि यह मामला केवल एक हवाई अड्डे के रद्द होने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राज्य के भूमि प्रबंधन और भविष्य की औद्योगिक नीतियों के लिए एक मिसाल है। यदि सरकार अधिग्रहित भूमि का उपयोग अन्य परियोजनाओं के लिए करती है, तो यह भविष्य के विकास मॉडलों को प्रभावित करेगा।
भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 2013 की धारा 93 सरकार को उस भूमि से पीछे हटने की अनुमति देती है जिसका कब्जा अभी तक नहीं लिया गया है। यदि सरकार ने मुआवजा दे दिया है लेकिन कब्जा नहीं लिया है, तो वह ब्याज सहित मुआवजा वापस लेकर जमीन लौटा सकती है। वहीं, धारा 101 के तहत यदि भूमि पांच वर्षों तक अप्रयुक्त रहती है, तो उसे मूल मालिकों को लौटाया जा सकता है।
| विवरण | परियोजना विवरण |
|---|---|
| कुल आवश्यक भूमि | 5,846 एकड़ |
| निजी भूमि (कुल) | 3,874 एकड़ |
| अधिग्रहित निजी भूमि | 1,802 एकड़ |
| परियोजना लागत | ₹27,400 करोड़ |
Frequently Asked Questions
1. क्या किसानों को उनकी जमीन वापस मिल सकती है?
हाँ, यदि सरकार ने भूमि का कब्जा नहीं लिया है, तो अधिनियम के तहत प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।
2. क्या सरकार इस भूमि का उपयोग किसी और काम के लिए कर सकती है?
हाँ, यदि सरकार ने भूमि का कब्जा ले लिया है, तो वह इसे अन्य सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए उपयोग कर सकती है।