हेग स्थित स्थायी मध्यस्थता न्यायालय ने आदेश दिया है कि सिंधु जल संधि पूरी तरह प्रभावी है और भारत को इसके दायित्वों का पालन करना चाहिए। भारत ने इस न्यायालय की वैधता को खारिज करते हुए इसे 'शून्य और void' करार दिया है।
- स्थायी मध्यस्थता न्यायालय ने सिंधु जल संधि (IWT) को पूरी तरह प्रभावी माना है।
- कोर्ट ने भारत को जम्मू-कश्मीर में रतले जलविद्युत संयंत्र के निर्माण पर कुछ अस्थायी प्रतिबंध लगाने का निर्देश दिया।
- भारत ने इस न्यायालय की मान्यता को खारिज कर दिया है और इसे अवैध बताया है।
- भारत का रुख है कि आतंकवाद और पानी एक साथ नहीं बह सकते।
हेग स्थित स्थायी मध्यस्थता न्यायालय (Permanent Court of Arbitration) ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए कहा है कि भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में हस्ताक्षरित सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) अभी भी पूरी तरह से लागू है। न्यायालय ने भारत को निर्देश दिया है कि वह संधि के तहत अपने सभी दायित्वों का पालन करना जारी रखे।
यह मामला तब गरमाया जब 23 अप्रैल, 2025 को पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत सरकार ने घोषणा की थी कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को 'विश्वसनीय और अपरिवर्तनीय' रूप से समाप्त नहीं करता, तब तक इस संधि को 'स्थगित' (abeyance) रखा जाएगा। न्यायालय ने भारत के इस कदम की समीक्षा की और निष्कर्ष निकाला कि संधि में किसी भी एक पक्ष को एकतरफा रूप से इसे निलंबित या समाप्त करने का अधिकार नहीं है।
रतले बांध विवाद और कोर्ट का आदेश
न्यायालय के निर्णय का एक बड़ा हिस्सा रतले जलविद्युत परियोजना से संबंधित है, जो चिनाब नदी पर स्थित एक 'रन-ऑफ-द-रिवर' प्रोजेक्ट है। पाकिस्तान ने इसके डिजाइन पर आपत्ति जताई थी। कोर्ट ने भारत को निर्देश दिया है कि वह रतले बांध की दीवार और बिजली सेवन संरचना (power intake structure) को निर्धारित स्तरों से ऊपर कंक्रीट न करे और निर्माण कार्यक्रम में किसी भी बदलाव की रिपोर्ट दे।
भारत द्वारा निर्णय की अस्वीकृति
भारत ने इस न्यायालय के फैसले को सिरे से खारिज कर दिया है। भारत का तर्क है कि यह मध्यस्थता न्यायालय अवैध रूप से गठित किया गया है। भारत का मानना है कि संधि के तहत 'तटस्थ विशेषज्ञ' (Neutral Expert) की प्रक्रिया ही विवाद समाधान का सही तरीका है, न कि कोई समानांतर अंतरराष्ट्रीय अदालत। भारत ने स्पष्ट किया है कि इस कोर्ट के सभी निर्णय 'शून्य' (null and void) हैं।
Why This Matters
BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, यह विवाद केवल पानी के बंटवारे का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता का है। भारत अब 'रणनीतिक धैर्य' की नीति से आगे बढ़कर 'कठोर जवाबदेही' की ओर बढ़ रहा है। भारत का यह संदेश स्पष्ट है कि जल संसाधनों का प्रबंधन आतंकवाद के साये में नहीं किया जा सकता।
"सिंधु जल संधि दशकों तक टिकी रही, लेकिन आधुनिक सुरक्षा चुनौतियां और जलवायु परिवर्तन अब इसे पुनर्गठित करने की मांग करते हैं।"
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
सिंधु जल संधि 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता में हस्ताक्षरित हुई थी। इसके तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों का बंटवारा किया गया, जिसमें तीन पूर्वी नदियों (रावी, ब्यास, सतलुज) पर भारत का और तीन पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम, चिनाब) पर मुख्य रूप से पाकिस्तान का अधिकार दिया गया, हालांकि भारत को पश्चिमी नदियों पर सीमित उपयोग (बिजली उत्पादन आदि) की अनुमति है।
| पक्ष | भारत का रुख | पाकिस्तान का रुख |
|---|---|---|
| न्यायालय की मान्यता | अवैध और शून्य | वैध और बाध्यकारी |
| विवाद समाधान | तटस्थ विशेषज्ञ (Neutral Expert) | मध्यस्थता न्यायालय (Court of Arbitration) |
| मुख्य चिंता | सीमा पार आतंकवाद | जल सुरक्षा (Water Security) |
Frequently Asked Questions
1. क्या भारत वास्तव में सिंधु जल संधि को समाप्त कर रहा है?
भारत ने संधि को 'स्थगित' (abeyance) रखने की बात कही है, न कि आधिकारिक तौर पर समाप्त करने की, जब तक कि आतंकवाद समाप्त नहीं होता।
2. रतले परियोजना क्या है?
यह जम्मू-कश्मीर में चिनाब नदी पर एक जलविद्युत परियोजना है, जिसका विरोध पाकिस्तान डिजाइन संबंधी तकनीकी कारणों से कर रहा है।