जम्मू-कश्मीर सरकार ने बादल फटने और ग्लेशियर फटने (GLOF) जैसी आपदाओं से निपटने के लिए तीन प्रमुख जलविद्युत परियोजनाओं में अत्याधुनिक पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित करने का निर्णय लिया है।

  • बगलिहार, अपर सिंद और परनई परियोजनाओं में सेंसर-आधारित चेतावनी प्रणाली लगेगी।
  • नेपाल में हाल ही में हुई विनाशकारी बाढ़ से सबक लेते हुए यह कदम उठाया गया है।
  • मुंडिस्कर झील को 'अत्यधिक संवेदनशील' श्रेणी में रखा गया है।
  • DMRRR एक GIS-आधारित मल्टी-हज़ार्ड रिस्क एटलस विकसित कर रहा है।

जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने प्राकृतिक आपदाओं, विशेष रूप से बादल फटने और ग्लेशियर झील विस्फोट बाढ़ (GLOF) के जोखिम को कम करने के लिए एक व्यापक रणनीति तैयार की है। जम्मू कश्मीर पावर डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (JKPDC) के प्रबंध निदेशक राहुल यादव के अनुसार, तीन महत्वपूर्ण जलविद्युत परियोजनाओं—900 मेगावाट की बगलिहार (रामबन), 105 मेगावाट की अपर सिंद (गंदरबल) और 37.5 मेगावाट की परनई (पुंछ)—में अर्ली वार्निंग सिस्टम (EWS) स्थापित करने के लिए निविदाएं जारी कर दी गई हैं।

यह प्रणाली बांधों और बैराजों के ऊपरी हिस्से में रणनीतिक स्थानों पर सेंसर और संचार उपकरण लगाने पर केंद्रित है। इससे आपदा आने पर अधिकारियों और स्थानीय निवासियों को एक से दो घंटे का महत्वपूर्ण रिस्पांस टाइम मिलेगा। डेटा ट्रांसमिशन की सटीकता सुनिश्चित करने के लिए 'सेंसर रिडंडेंसी' का उपयोग किया जाएगा, जिसका अर्थ है कि यदि एक सेंसर विफल होता है, तो दूसरा स्वचालित रूप से कार्यभार संभाल लेगा।

Why This Matters

BozokMedia analysis shows कि हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियरों का पिघलना और अचानक आने वाली बाढ़ (Flash Floods) की घटनाएं बढ़ी हैं। नेपाल की हालिया त्रासदी, जो चीन सीमा पर एक ग्लेशियर झील फटने से हुई थी, ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बिना पूर्व चेतावनी के ऐसे क्षेत्रों में जान-माल का भारी नुकसान तय है। जम्मू-कश्मीर के चेनाब घाटी जैसे क्षेत्रों में, जहाँ पिछले साल चिशोती में 50 लोगों की जान गई थी, ऐसी प्रणालियाँ जीवनरक्षक साबित होंगी।

"उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सेंसर-आधारित निगरानी ही एकमात्र तरीका है जिससे हम प्रकृति के अप्रत्याशित प्रकोप के खिलाफ सेकंडों का समय जीत सकते हैं।"

किश्तवाड़ के उपायुक्त पंकज शर्मा ने बताया कि आपदा प्रबंधन, राहत, पुनर्वास और पुनर्निर्माण विभाग (DMRRR) ने कई अध्ययन किए हैं, जिनमें मुंडिस्कर झील को 'अत्यधिक संवेदनशील' माना गया है। प्रशासन ने इस दिशा में 35 करोड़ रुपये का प्रस्ताव भेजा है ताकि शमन उपायों को लागू किया जा सके।

कश्मीर विश्वविद्यालय के भू-सूचना विज्ञान विभाग के एक अध्ययन के अनुसार, कश्मीर हिमालय की पांच ग्लेशियर झीलें—ब्रामसर, क्रिसर, नुंदगोल, भागसर और गंगाबल—'अत्यधिक संवेदनशीलता' वर्ग में आती हैं। ये झीलें यदि फटती हैं, तो डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों में 2,704 इमारतों और 15 प्रमुख पुलों के लिए गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।

परियोजना का नाम क्षमता (MW) स्थान (जिला)
बगलिहार 900 MW रामबन
अपर सिंद 105 MW गंदरबल
परनई 37.5 MW पुंछ

DMRRR अब एक पांच-सूत्रीय रणनीति लागू कर रहा है, जिसमें डिजिटल इलाके और ऊंचाई मॉडलिंग का उपयोग करके GIS-आधारित मल्टी-हज़ार्ड रिस्क एटलस बनाना, भवन सुरक्षा कोड लागू करना और भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) के साथ भूस्खलन पूर्वानुमान के लिए समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर करना शामिल है।

क्या आप जानते हैं?: ग्लेशियर झील विस्फोट बाढ़ (GLOF) तब होती है जब किसी ग्लेशियर द्वारा बनाए गए प्राकृतिक बांध (मोरेन) टूट जाते हैं, जिससे लाखों गैलन पानी अचानक नीचे की ओर बहता है।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: अर्ली वार्निंग सिस्टम कैसे काम करता है?
यह सिस्टम नदियों के ऊपरी हिस्से में सेंसर लगाता है जो जल स्तर में अचानक वृद्धि को पहचानते हैं और तुरंत चेतावनी संदेश भेजते हैं।

प्रश्न 2: किन जिलों को सबसे अधिक जोखिम वाला माना गया है?
किश्तवाड़, डोडा और रामबन जिलों को भूस्खलन और बाढ़ के लिए अत्यधिक संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है।