मार्च से जारी सूखे और अनियमित दक्षिण-पश्चिम मानसून ने चित्तूर के वर्षा-आधारित खेतों को फसल विफलता के कगार पर खड़ा कर दिया है। मूंगफली की फसल सबसे अधिक प्रभावित हुई है।
- चित्तूर की लगभग 70% कृषि भूमि वर्षा-आधारित है, जिससे यह मौसम के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है।
- जिले की मुख्य फसल, मूंगफली, अनियमित वर्षा के कारण उत्पादकता जोखिम का सामना कर रही है।
- एल नीनो (El Niño) की स्थितियों ने सूखे की अवधि को बढ़ा दिया है, जिससे फसलों के विकास में बाधा आई है।
चित्तूर का कृषि परिदृश्य वर्तमान में एक गंभीर संकट से जूझ रहा है क्योंकि खरीफ सीजन अपने समापन की ओर है। क्षेत्र के किसान मार्च से शुरू हुए लंबे सूखे और अनियमित दक्षिण-पश्चिम मानसून के दोहरे प्रहार का सामना कर रहे हैं। इस अस्थिरता के कारण पलानेर के पास भूमि का एक बड़ा हिस्सा या तो बिना बुवाई के रह गया है या फसलें सूख रही हैं।
आंकड़ों के अनुसार, इस क्षेत्र की संवेदनशीलता स्पष्ट है। NABARD के आंकड़ों के मुताबिक, चित्तूर में शुद्ध बोया गया क्षेत्र लगभग 3.62 लाख हेक्टेयर है और कुल फसली क्षेत्र 4.20 लाख हेक्टेयर है। हालांकि, इसमें से 70% भूमि पारंपरिक रूप से वर्षा-आधारित है, जबकि खरीफ सीजन के दौरान केवल 38% क्षेत्र ही सिंचाई सुविधाओं से लैस है। प्रकृति पर यह अत्यधिक निर्भरता स्थानीय किसानों के लिए आर्थिक आपदा बन गई है।
'किंग क्रॉप' मूंगफली पर संकट
मूंगफली, जिसे जिले की 'किंग क्रॉप' कहा जाता है, इस संकट के केंद्र में है। मूंगफली की उत्पादकता पूरी तरह से दक्षिण-पश्चिम मानसून के समय और मात्रा पर निर्भर करती है। वर्ष 2020-21 में, मूंगफली की खेती 76,624 हेक्टेयर में की गई थी, जिससे 83,137 टन उत्पादन हुआ था। इसके विपरीत, वर्तमान सीजन में जून के मध्य तक 62,223 हेक्टेयर में बुवाई की गई थी, लेकिन समय पर बारिश न होने से यह निवेश खतरे में पड़ गया है।
BozokMedia विश्लेषण दर्शाता है कि चित्तूर भारतीय वर्षा-आधारित कृषि की प्रणालीगत कमजोरी का एक प्रमुख उदाहरण है। जब खाद्य आपूर्ति और किसानों की आय का एक बड़ा हिस्सा बारिश की एक छोटी सी खिड़की पर निर्भर होता है, तो एल नीनो जैसा कोई भी बदलाव क्षेत्रीय आर्थिक मंदी पैदा कर सकता है। सिंचाई के बुनियादी ढांचे की कमी एक प्राकृतिक घटना को सामाजिक-आर्थिक आपदा में बदल देती है।
"चित्तूर में दो-तिहाई कृषि वर्षा की स्थितियों पर निर्भर है, जिससे किसानों का नियंत्रण बहुत कम रह जाता है। मौसम ही यहाँ के आर्थिक संतुलन को तय करता है।"
बारिश का भौगोलिक वितरण समस्या को और जटिल बनाता है। जहाँ पश्चिमी और मध्य मंडल पूरी तरह से दक्षिण-पश्चिम मानसून पर निर्भर हैं, वहीं पूर्वी क्षेत्र उत्तर-पूर्वी मानसून से अधिक वर्षा प्राप्त करते हैं। इसका मतलब है कि जिले में रिकवरी एक समान नहीं होगी, जिससे कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक संकट पैदा होगा।
ऐतिहासिक डेटा अत्यधिक अस्थिरता को दर्शाता है। उदाहरण के लिए, 2014 में वर्षा घटकर 491 मिमी रह गई थी, जबकि 2021 में यह बढ़कर 1,434 मिमी हो गई थी। 'सूखा या बाढ़' का यह चक्र छोटे किसानों के लिए दीर्घकालिक फसल प्रबंधन को लगभग असंभव बना देता है।
| पैमाना | 2020-21 (मूंगफली) | वर्तमान खरीफ (बोया गया क्षेत्र) |
|---|---|---|
| क्षेत्र (हेक्टेयर) | 76,624 | 62,223 |
| उत्पादन/स्थिति | 83,137 टन | विफलता का उच्च जोखिम |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: चित्तूर में विशेष रूप से मूंगफली क्यों प्रभावित है?
मूंगफली अपने विकास के महत्वपूर्ण चरणों के दौरान पानी की उपलब्धता के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होती है और इस क्षेत्र में दक्षिण-पश्चिम मानसून पर निर्भर करती है।
प्रश्न 2: एल नीनो (El Niño) इस क्षेत्र को कैसे प्रभावित करता है?
एल नीनो आमतौर पर मानसून के पैटर्न को बाधित करता है, जिससे बारिश में देरी या लंबे समय तक सूखा पड़ता है, जैसा कि वर्तमान में चित्तूर में देखा जा रहा है।