तेलंगाना में मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) के दौरान उन लोगों से भी दशकों पुराने दस्तावेज मांगे जा रहे हैं जिनका जन्म उस समय हुआ ही नहीं था। मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने अब चुनाव आयोग से हस्तक्षेप और अतिरिक्त समय की मांग की है।

  • तेलंगाना के मतदाताओं को SIR नोटिस मिले हैं जिनमें 1980 के दशक के दस्तावेजों की मांग की गई है।
  • आरोप है कि कुछ सत्यापन मामलों में आधार और पैन जैसे सरकारी आईडी को खारिज किया जा रहा है।
  • मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने भारत निर्वाचन आयोग (ECI) से चार सप्ताह के समय विस्तार की मांग की है।
  • तेलंगाना के लगभग 21.7% मतदाता प्रविष्टियों को ASDD (अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत और डुप्लिकेट) श्रेणी में रखा गया है।

तेलंगाना में मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) ने मतदाताओं के बीच भारी भ्रम और डर पैदा कर दिया है। हैदराबाद और अन्य क्षेत्रों के निवासियों का कहना है कि उन्हें ऐसी सुनवाईयों में बुलाया जा रहा है जहाँ उनसे दशकों पुराने पहचान और पते के प्रमाण मांगे जा रहे हैं—कुछ तो 1987 के हैं—ताकि मतदाता सूची में उनका नाम बरकरार रखा जा सके।

इन मांगों की विसंगति तब सामने आई जब साईं कनमूदराज नामक एक मतदाता से 1987 का दस्तावेज मांगा गया, जबकि उनका जन्म उस समय हुआ ही नहीं था। कनमूदराज के अनुसार, अधिकारियों ने उनके आधार और पैन कार्ड को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, जिससे वह हैरान रह गए कि कोई व्यक्ति अपने जन्म से पहले के रिकॉर्ड कहाँ से ला सकता है। आधुनिक डिजिटल आईडी को खारिज करने के इस पैटर्न ने जनता में आक्रोश बढ़ा दिया है।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि यदि इस प्रशासनिक समस्या का तुरंत समाधान नहीं किया गया, तो यह बड़े पैमाने पर मतदाताओं को उनके मताधिकार से वंचित कर सकता है। जब राज्य के प्राथमिक पहचान दस्तावेजों (आधार/पैन) को चुनावी सत्यापन के लिए अपर्याप्त माना जाता है, तो यह एक प्रणालीगत विफलता है जो विशेष रूप से युवाओं और वंचित समूहों को प्रभावित करती है जिनके पास पुराने रिकॉर्ड नहीं होते।

डिजिटल गवर्नेंस के युग में पुराने दस्तावेजों की मांग करना एक प्रशासनिक विसंगति है जो वोट देने के मौलिक अधिकार को खतरे में डालती है।

एक अन्य प्रभावित महिला, जो वर्षों से एक ही बूथ से मतदान कर रही थीं, ने बताया कि आधार कार्ड देने के बावजूद अधिकारियों ने उनसे बैंक संबंधी प्रमाण और पते का अतिरिक्त सत्यापन मांगा। उन्होंने बताया कि उनके 10वीं कक्षा के प्रमाण पत्र में फोटो नहीं थी, जिससे वह वर्तमान सत्यापन मानकों के लिए बेकार हो गया, फिर भी उनसे और सबूत मांगे गए।

प्रशासनिक स्तर पर, प्रभारी सहायक नगर आयुक्त और एआरओ जी वसंत कुमार ने इस प्रक्रिया का बचाव करते हुए कहा कि नोटिस ASDD (अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत और डुप्लिकेट) प्रविष्टियों के सत्यापन और मैपिंग विसंगतियों को दूर करने का एक मानक हिस्सा हैं। उन्होंने बताया कि सूची को शुद्ध करने के लिए प्रतिदिन सैकड़ों नोटिस जारी किए जा रहे हैं।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

मतदाता सूची का संशोधन भारत निर्वाचन आयोग द्वारा समय-समय पर किया जाने वाला अभ्यास है ताकि सूची की सटीकता सुनिश्चित की जा सके। हालाँकि, 'विशेष गहन संशोधन' अधिक कठोर होता है। तेलंगाना में इस संशोधन का पैमाना बहुत बड़ा है, जहाँ 3.38 करोड़ कुल मतदाताओं में से लगभग 73.39 लाख प्रविष्टियाँ (करीब 21.7%) ASDD श्रेणी में हैं, जिससे यह प्रक्रिया अत्यधिक संवेदनशील हो गई है।

श्रेणीविवरण
कुल मतदाता (10 जून तक)3.38 करोड़
ASDD चिह्नित प्रविष्टियाँ73.39 लाख
चिह्नित प्रतिशत~21.7%
मांगा गया अतिरिक्त समय4 सप्ताह
क्या आप जानते हैं?: ASDD का अर्थ 'Absent, Shifted, Dead, and Duplicate' है, और यह वह प्राथमिक तंत्र है जिसका उपयोग चुनाव आयोग फर्जी मतदाताओं को हटाने के लिए करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: कुछ SIR सुनवाईयों में आधार और पैन कार्ड को क्यों खारिज किया जा रहा है?
यद्यपि आधिकारिक तौर पर इन्हें प्रतिबंधित नहीं किया गया है, लेकिन कुछ स्थानीय अधिकारी निवास या जन्म तिथि स्थापित करने के लिए विशिष्ट ऐतिहासिक प्रमाण मांग रहे हैं जो उनके आंतरिक मानदंडों के अनुसार इन आईडी से स्पष्ट नहीं होते।

प्रश्न 2: तेलंगाना सरकार ने क्या कदम उठाए हैं?
मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र लिखकर चार सप्ताह के विस्तार और शहरी क्षेत्रों में हेल्पडेस्क स्थापित करने की मांग की है ताकि किसी भी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से न कटे।