भारतीय संविधान का अनुच्छेद 124(3) राष्ट्रपति को 'प्रतिष्ठित न्यायविदों' को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश नियुक्त करने की अनुमति देता है, लेकिन 76 वर्षों में इसका उपयोग नहीं किया गया। जस्टिस उज्जवल भुइयां ने अब इस पर विचार करने की अपील की है।

  • अनुच्छेद 124(3) सुप्रीम कोर्ट में 'प्रतिष्ठित न्यायविदों' की नियुक्ति की अनुमति देता है।
  • स्वतंत्रता के 76 वर्षों में इस मार्ग से एक भी नियुक्ति नहीं हुई है।
  • जस्टिस उज्जवल भुइयां के अनुसार, इससे बेंच में विविधता आएगी और कानूनी बारीकियों से परे व्यापक दृष्टिकोण मिलेगा।
  • कोलेजियम प्रणाली और बार काउंसिल के नियम इस नियुक्ति में बड़ी बाधा हैं।

दशकों से भारतीय संविधान का एक महत्वपूर्ण प्रावधान केवल कागजों तक सीमित है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति आमतौर पर हाई कोर्ट के न्यायाधीशों या वरिष्ठ अधिवक्ताओं के माध्यम से होती है, लेकिन अनुच्छेद 124(3) एक तीसरा विकल्प देता है: राष्ट्रपति की राय में एक "प्रतिष्ठित न्यायविद्" (Distinguished Jurist) की नियुक्ति।

हाल ही में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी दिल्ली में जस्टिस उज्जवल भुइयां ने इस "अप्रयुक्त जनादेश" की ओर इशारा करते हुए कहा कि इस पर गंभीर ध्यान देने की आवश्यकता है। उनका तर्क है कि कानूनी शिक्षाविदों और विद्वानों की भागीदारी से सुप्रीम कोर्ट की निर्णय लेने की प्रक्रिया में एक नया आयाम जुड़ेगा और न्यायालय केवल तकनीकी बारीकियों तक सीमित नहीं रहेगा।

संवैधानिक पृष्ठभूमि और इतिहास

यह प्रावधान 24 मई, 1949 को संविधान सभा की बहसों के दौरान जोड़ा गया था। एच.वी. कामथ ने तर्क दिया था कि उम्मीदवारों का दायरा केवल न्यायाधीशों या अधिवक्ताओं तक सीमित नहीं होना चाहिए। उन्होंने उन पुरुषों और महिलाओं को शामिल करने की वकालत की जिनके पास उत्कृष्ट कानूनी ज्ञान हो, भले ही उन्होंने कभी अदालत में प्रैक्टिस न की हो। उन्होंने हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का उदाहरण दिया था।

डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने भी इस विचार का विरोध नहीं किया, हालांकि वह "प्रतिष्ठित" शब्द के बजाय "विख्यात" (Eminent) शब्द के उपयोग पर विचार कर रहे थे। उद्देश्य यह था कि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट की तरह, जहां हार्वर्ड जैसे विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों को नियुक्त किया गया, भारत भी अकादमिक गहराई का लाभ उठा सके।

यह क्यों महत्वपूर्ण है?

BozokMedia विश्लेषण दर्शाता है कि इस प्रावधान की अनदेखी यह बताती है कि भारतीय न्यायपालिका 'अकादमिक ज्ञान' की तुलना में 'कोर्टरूम अनुभव' को अधिक प्राथमिकता देती है। यदि प्रतिष्ठित न्यायविदों को नियुक्त किया जाता है, तो यह न केवल बेंच का विविधीकरण करेगा, बल्कि सार्वजनिक कानून (Public Law) के मुद्दों पर अधिक संतुलित और दार्शनिक दृष्टिकोण प्रदान करेगा।

एक प्रतिष्ठित न्यायविद् की नियुक्ति न होना यह दर्शाता है कि हमारी सर्वोच्च अदालत सैद्धांतिक गहराई के बजाय प्रक्रियात्मक विशेषज्ञता को अधिक महत्व देती है।

नियुक्ति में आने वाली बाधाएं

जस्टिस भुइयां ने इसके दो संभावित कारण बताए: पहला, यह धारणा कि भारतीय अकादमिक क्षेत्र में इतनी गहराई नहीं है, और दूसरा, सरकार तथा कोलेजियम द्वारा इस प्रावधान की अनदेखी। लेकिन वास्तविक समस्या कोलेजियम प्रणाली में है। वर्तमान में, किसी भी नियुक्ति के लिए कोलेजियम की सिफारिश अनिवार्य है, और न्यायाधीश अक्सर अपने जैसे ही पेशेवर पृष्ठभूमि वाले लोगों को प्राथमिकता देते हैं।

इसके अलावा, बार काउंसिल के नियम पूर्णकालिक कानून शिक्षकों को प्रैक्टिस करने से रोकते हैं, जिससे एक विरोधाभास पैदा होता है—जो व्यक्ति 'न्यायविद्' के रूप में सबसे योग्य है, उसे कानूनी तौर पर उस प्रैक्टिस से दूर रखा जाता है जो न्यायाधीश बनने का पारंपरिक रास्ता है।

नियुक्ति का मार्ग आवश्यकता उपयोग की आवृत्ति
हाई कोर्ट से पदोन्नति 5 वर्ष का अनुभव अत्यधिक
बार से सीधी नियुक्ति 10 वर्ष की वकालत मध्यम/कम
प्रतिष्ठित न्यायविद् राष्ट्रपति की राय शून्य
क्या आप जानते हैं?: 42वें संशोधन के माध्यम से हाई कोर्ट में भी 'प्रतिष्ठित न्यायविद्' की नियुक्ति का प्रावधान जोड़ा गया था, लेकिन बाद में 44वें संशोधन द्वारा इसे हटा दिया गया।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: 'प्रतिष्ठित न्यायविद्' कौन हो सकता है?
कोई भी व्यक्ति जो कानून के शिक्षण, अनुसंधान या अभ्यास में गंभीर कार्य कर रहा हो और जिसके पास उत्कृष्ट कानूनी ज्ञान हो, भले ही उसके पास कोर्टरूम का अनुभव न हो।

प्रश्न 2: क्या राष्ट्रपति अपनी मर्जी से नियुक्ति कर सकते हैं?
संविधान में 'राष्ट्रपति की राय' लिखा है, लेकिन वर्तमान व्यवस्था में कोलेजियम की सिफारिश के बिना नियुक्ति संभव नहीं है।