संसदीय स्थायी समिति ने निजी अस्पतालों में बढ़ते कॉर्पोरेटकरण और इलाज की बढ़ती लागत के प्रति आगाह करते हुए एफडीआई (FDI) नियमों की समीक्षा की सिफारिश की है। समिति ने सुझाव दिया है कि विदेशी पूंजी को अस्पताल संचालन के बजाय चिकित्सा उपकरणों के निर्माण में लगाया जाना चाहिए।

  • निजी अस्पतालों में बढ़ते कॉर्पोरेटकरण से इलाज महंगा होने की चेतावनी।
  • चिकित्सा उपकरणों और दवाओं के निर्माण में एफडीआई को प्रोत्साहित करने का सुझाव।
  • बीपीएल और ईडब्ल्यूएस मरीजों के लिए बेड का आरक्षण 10% से बढ़ाकर 20% करने की सिफारिश।
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत करने पर जोर।

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट पेश की है, जिसमें निजी अस्पतालों के संचालन और अधिग्रहण से जुड़े प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के नियमों की समीक्षा और युक्तिकरण की सिफारिश की गई है। समिति ने चेतावनी दी है कि निजी क्षेत्र में आक्रामक कॉर्पोरेटकरण स्वास्थ्य सेवाओं को एक जन सेवा के बजाय 'पूरी तरह से पूंजीवादी उद्यम' में बदल सकता है, जिससे चिकित्सा लागत में भारी वृद्धि होने की संभावना है।

समाजवादी पार्टी के राज्यसभा सांसद राम गोपाल यादव की अध्यक्षता वाली समिति ने अपनी 176वीं रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि विदेशी पूंजी का उपयोग अस्पतालों के प्रत्यक्ष संचालन और अधिग्रहण के बजाय चिकित्सा उपकरणों, उपभोग्य सामग्रियों और दुर्लभ बीमारियों के लिए विशेष दवाओं के घरेलू निर्माण में किया जाना चाहिए। समिति का मानना है कि बड़े कॉर्पोरेट घराने छोटे और किफायती अस्पतालों का अधिग्रहण कर रहे हैं, जिससे स्वास्थ्य सेवा की सामर्थ्य कम हो रही है।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि भारत में स्वास्थ्य सेवा का निजीकरण एक दोधारी तलवार है। जहाँ एक ओर निजी निवेश से आधुनिक तकनीक आती है, वहीं दूसरी ओर यह मध्यम वर्ग और गरीब आबादी के लिए इलाज को पहुंच से बाहर कर सकता है। यदि एफडीआई को केवल सेवाओं के विस्तार के बजाय बुनियादी ढांचे और विनिर्माण (manufacturing) की ओर मोड़ा जाता है, तो यह लागत को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है।

अस्पताल संचालन में अनियंत्रित विदेशी निवेश स्वास्थ्य सेवा को एक सेवा के बजाय केवल मुनाफे का जरिया बना सकता है।

रिपोर्ट में सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बीच लागत के बढ़ते अंतर पर भी चिंता जताई गई है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (NSS) के आंकड़ों का हवाला देते हुए, समिति ने बताया कि निजी अस्पतालों में अस्पताल में भर्ती होने की औसत लागत ₹50,508 है, जबकि सरकारी अस्पतालों में यह मात्र ₹6,631 है। इस अंतर को कम करने के लिए समिति ने आवश्यक उपचारों और डायग्नोस्टिक्स की लागत को सीमित करने के लिए तंत्र बनाने का सुझाव दिया है।

समिति ने सुझाव दिया है कि सरकार को टियर-2, टियर-3 और ग्रामीण क्षेत्रों में मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पतालों को आकर्षित करने के लिए टैक्स हॉलिडे, रियायती भूमि और सस्ती बिजली जैसे प्रोत्साहन देने चाहिए। साथ ही, निजी अस्पतालों को अंतरराष्ट्रीय मरीजों से होने वाली आय का उपयोग गरीब मरीजों के इलाज के लिए 'क्रॉस-सब्सिडाइजेशन' के माध्यम से करना चाहिए।

Did You Know?: भारत में सरकारी और निजी अस्पतालों के बीच इलाज की लागत में लगभग 8 गुना का अंतर पाया गया है।

Frequently Asked Questions

1. संसदीय समिति ने एफडीआई के बारे में क्या सुझाव दिया है?
समिति ने सुझाव दिया है कि एफडीआई को अस्पतालों के संचालन के बजाय चिकित्सा उपकरणों और दवाओं के निर्माण की ओर केंद्रित किया जाना चाहिए।

2. गरीब मरीजों के लिए क्या सिफारिश की गई है?
समिति ने बीपीएल और ईडब्ल्यूएस लाभार्थियों के लिए निजी अस्पतालों में बेड का अनिवार्य आरक्षण 10% से बढ़ाकर 20% करने की सिफारिश की है।