श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय के सिंडिकेट द्वारा परीक्षा टैबुलेशन रजिस्टरों के अधूरे हस्ताक्षरों को लेकर लिए गए निर्णय का यूडीएफ सदस्यों ने कड़ा विरोध किया है। सदस्यों का तर्क है कि इस फैसले से छात्रों के डिग्री प्रमाणपत्रों में देरी होगी।
- यूडीएफ सिंडिकेट सदस्यों ने परीक्षा रजिस्टरों पर हस्ताक्षर संबंधी निर्णय को रद्द करने का विरोध किया।
- सदस्यों का मानना है कि इस फैसले से छात्रों के डिग्री प्रमाणपत्रों के वितरण में देरी होगी।
- विश्वविद्यालय प्रशासन ने अनियमितताओं की जांच के लिए एक उप-समिति का गठन किया है।
केरल स्थित श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय (SSUS) में प्रशासनिक खींचतान तेज हो गई है। विश्वविद्यालय के पुनर्गठित सिंडिकेट में यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) के नामांकित सदस्यों ने हाल ही में लिए गए एक महत्वपूर्ण निर्णय पर आपत्ति जताई है। विवाद का मुख्य केंद्र परीक्षा टैबुलेशन रजिस्टरों (Tabulation Registers) पर अधिकारियों के हस्ताक्षर न होने का मामला है।
यूडीएफ सदस्यों ने कुलपति सिज़ा थॉमस (Ciza Thomas) को भेजे एक पत्र में स्पष्ट किया है कि 22 अगस्त 2026 को आयोजित विशेष सिंडिकेट बैठक में लिया गया निर्णय अव्यावहारिक है। इस निर्णय के तहत 17 जुलाई के उस आदेश को रद्द कर दिया गया था, जिसमें उन अधिकारियों को टैबुलेशन रजिस्टरों पर हस्ताक्षर करने की अनुमति दी गई थी, जिन्होंने अंतिम अंक सूचियाँ जारी होने से पहले हस्ताक्षर नहीं किए थे।
क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह विवाद केवल प्रशासनिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर हजारों छात्रों के भविष्य पर पड़ सकता है। यदि पुराने रजिस्टरों को अधूरा माना जाता है, तो डिग्री प्रमाणपत्रों के जारी होने की प्रक्रिया लंबी खिंच सकती है, जिससे छात्रों के करियर और उच्च शिक्षा में बाधा आएगी।
सिंडिकेट सदस्य के. बी. साबू ने कहा, 'अधूरे रजिस्टरों के कारण निर्णय को पूरी तरह रद्द करना व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि इससे छात्रों के डिग्री प्रमाणपत्रों में देरी होगी।'
विश्वविद्यालय अधिकारियों का कहना है कि 22 अगस्त की बैठक में टैबुलेशन रजिस्टरों में पाई गई खामियों पर विस्तृत चर्चा की गई थी। प्रारंभिक जांच में पाया गया कि 2018 से आयोजित परीक्षाओं के रजिस्टरों में कई अधिकारियों ने हस्ताक्षर नहीं किए थे। इसमें वे अधिकारी भी शामिल हैं जो अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
विश्वविद्यालयों में परीक्षा प्रशासन और टैबुलेशन रजिस्टरों का रखरखाव एक अत्यंत संवेदनशील प्रक्रिया है। ऐतिहासिक रूप से, इन रजिस्टरों में किसी भी प्रकार की विसंगति या हस्ताक्षर की कमी को शैक्षणिक अखंडता के लिए खतरा माना जाता है, जिसके कारण अक्सर प्रशासनिक सुधार और जांच के आदेश दिए जाते हैं।
वर्तमान में, सिंडिकेट ने इन कथित अनियमितताओं की जांच के लिए एक उप-समिति का गठन किया है। प्रशासन का तर्क है कि 17 जुलाई के निर्णय के कार्यान्वयन में भी कुछ जल्दबाजी बरती गई थी, जहाँ आधिकारिक आदेश जारी होने से पहले ही कुछ अधिकारियों को हस्ताक्षर करने के लिए कह दिया गया था।
Frequently Asked Questions
1. यूडीएफ सदस्यों की मुख्य चिंता क्या है?
उनका मुख्य तर्क है कि रजिस्टरों के अधूरे हस्ताक्षरों के कारण निर्णय रद्द करने से छात्रों के डिग्री प्रमाणपत्रों में देरी होगी।
2. विश्वविद्यालय प्रशासन क्या कदम उठा रहा है?
प्रशासन ने कथित अनियमितताओं की जांच के लिए एक विशेष उप-समिति का गठन किया है।