विशाखापत्तनम के नागरिक समाज ने नए एआई (AI) डेटा केंद्रों की मंजूरी पर रोक लगाने की मांग की है। उन्होंने पानी की कमी, भूमि अधिग्रहण और पारदर्शिता जैसे गंभीर मुद्दों पर चिंता जताई है।

  • 650 से अधिक प्रतिनिधियों ने एआई डेटा केंद्रों की मंजूरी पर रोक लगाने के लिए जन सम्मेलन में भाग लिया।
  • पानी की कमी और जनजातीय समुदायों के विस्थापन पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई।
  • 'विशाखापत्तनम घोषणापत्र' के माध्यम से छह सूत्रीय मांगें रखी गईं।
  • प्रस्तावित 6,500 मेगावाट गूगल डेटा सेंटर के लिए संसाधनों के आवंटन पर सवाल उठाए गए।

विशाखापत्तनम: आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में नागरिक समाज के एक बड़े समूह ने नए हाइपरस्केल एआई (AI) डेटा केंद्रों की मंजूरी पर तत्काल रोक लगाने की मांग की है। 'सोसाइटी फॉर ग्रीन विशाखा' द्वारा आयोजित एक जन सम्मेलन में 650 से अधिक कार्यकर्ता, शोधकर्ता, कानूनी विशेषज्ञ और सामुदायिक नेता शामिल हुए। इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य एक स्वतंत्र, संचयी पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव अध्ययन होने तक नए प्रोजेक्ट्स पर रोक लगाना है।

ग्रीन विशाखा के अध्यक्ष राजा राम मोहन रॉय ने स्पष्ट किया कि उनका विरोध तकनीक से नहीं, बल्कि विकास के तरीके से है। उन्होंने कहा कि तकनीकी प्रगति में न्याय, जिम्मेदारी और स्थिरता का होना अनिवार्य है। सम्मेलन में यह मांग उठाई गई कि विकास की प्रक्रिया में 'पर्यावरणीय न्याय' और 'मानवीय गरिमा' को केंद्र में रखा जाना चाहिए।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह संघर्ष केवल तकनीक बनाम प्रकृति का नहीं है, बल्कि यह संसाधनों के वितरण और कॉर्पोरेट जवाबदेही का एक बड़ा मुद्दा है। यदि डेटा केंद्रों के लिए पानी और बिजली का अत्यधिक उपयोग होता है, तो यह स्थानीय समुदायों के जीवन स्तर को सीधे प्रभावित कर सकता है।

पूर्व केंद्रीय ऊर्जा सचिव और सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी ई.ए.एस. सरमा ने सम्मेलन में मुख्य वक्ता के रूप में भाग लिया। उन्होंने विशाखापत्तनम जैसे जल-तनावग्रस्त शहर में प्रस्तावित 6,500 मेगावाट के गूगल डेटा सेंटर को भारी सब्सिडी देने पर सवाल उठाए। सरमा ने तर्क दिया कि पोलावरम सिंचाई परियोजना के तहत आदिवासी परिवारों का विस्थापन और उन्हें अपर्याप्त मुआवजा देना, वास्तव में डेटा सेंटर को दी जाने वाली एक अप्रत्यक्ष सब्सिडी है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मानवाधिकारों का उल्लंघन है।

विकास का अर्थ विस्थापन या कानूनी रूप से संरक्षित अधिकारों का क्षरण नहीं हो सकता।

कानूनी विशेषज्ञों ने भी इस मामले में गंभीर अनियमितताओं की ओर इशारा किया है। मद्रास उच्च न्यायालय के अधिवक्ता डी. नागासैला ने आरोप लगाया कि डेटा सेंटर प्रोजेक्ट के लिए पर्यावरणीय मंजूरी बिना किसी पर्याप्त जांच के कुछ ही दिनों के भीतर दे दी गई थी। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने भी इस मामले में याचिकाओं को स्वीकार किया है।

सम्मेलन के अंत में, ग्रीन विशाखा के महासचिव एन. चंद्रशेखर ने 'विशाखापत्तनम घोषणापत्र' जारी किया। इस छह-सूत्रीय घोषणापत्र में नई मंजूरियों पर रोक, प्रोजेक्ट समझौतों का खुलासा, स्वतंत्र ऊर्जा और जल ऑडिट, और प्रभावित समुदायों के भूमि अधिकारों की बहाली की मांग की गई है।

Did You Know?: एआई डेटा सेंटर को ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में पानी और बिजली की आवश्यकता होती है, जो अक्सर स्थानीय कृषि और घरेलू आपूर्ति के साथ प्रतिस्पर्धा करती है।

Frequently Asked Questions

1. नागरिक समाज किस बात का विरोध कर रहे हैं?
वे एआई डेटा केंद्रों की मंजूरी पर तब तक रोक लगाने की मांग कर रहे हैं जब तक कि उनका व्यापक पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव अध्ययन न हो जाए।

2. मुख्य चिंताएं क्या हैं?
मुख्य चिंताओं में पानी की कमी, भूमि का अधिग्रहण, आदिवासी समुदायों का विस्थापन और पारदर्शिता की कमी शामिल है।