केंद्र सरकार के दो मंत्रालयों के बीच वन भूमि के उपयोग के लिए ग्राम सभा की अनिवार्य सहमति को लेकर विवाद छिड़ गया है। जनजातीय कार्य मंत्रालय ने अब इस प्रक्रिया से खुद को अलग कर लिया है, जिससे बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की गति प्रभावित हो सकती है।
- जनजातीय कार्य मंत्रालय (MoTA) का दावा है कि वन मंजूरी के लिए ग्राम सभा की सहमति का प्रावधान FRA 2006 में नहीं है।
- NHPC ने बताया कि 100% सहमति की आवश्यकता के कारण परियोजनाओं में औसतन 106 महीने की देरी हो रही है।
- संसदीय समिति ने 'क्वालिफाइड सुपरमेजॉरिटी' (70-75% सहमति) का सुझाव दिया है।
- तीस्ता-IV जैसी महत्वपूर्ण जलविद्युत परियोजनाएं कुछ ग्राम पंचायतों की असहमति के कारण रुकी हुई हैं।
भारत में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं, विशेष रूप से जलविद्युत परियोजनाओं के कार्यान्वयन में वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 और वन मंजूरी की प्रक्रिया एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। हाल ही में, जनजातीय कार्य मंत्रालय (MoTA) और विद्युत मंत्रालय के बीच एक गंभीर बहस छिड़ी है। MoTA ने स्पष्ट किया है कि 2006 के कानून में वन मंजूरी के लिए ग्राम सभा की सहमति प्राप्त करने का कोई विशिष्ट प्रावधान नहीं है और यह उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर का मामला है।
यह विवाद तब शुरू हुआ जब 3 अगस्त को नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (NHPC) पर संसदीय स्थायी समिति की एक रिपोर्ट सामने आई। इस रिपोर्ट में बताया गया कि '100% ग्राम सभा सहमति' की अनिवार्यता परियोजनाओं के लिए सबसे बड़ा 'बॉटलनेक' या बाधा बन गई है। NHPC के आंकड़ों के अनुसार, निर्माणाधीन परियोजनाओं के लिए वन मंजूरी प्राप्त करने में औसतन 106 महीने का समय लग रहा है, जो कि विकास की गति को धीमा कर रहा है।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह टकराव केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि वैधानिक है। एक तरफ सरकार 'राष्ट्रीय महत्व' की परियोजनाओं को तेजी से पूरा करना चाहती है, वहीं दूसरी तरफ आदिवासी समुदायों के अधिकारों की रक्षा करने वाले कानून हैं। यदि MoTA इस प्रक्रिया से दूरी बनाता है, तो इससे भविष्य में कानूनी जटिलताएं बढ़ सकती हैं क्योंकि FRA का कार्यान्वयन इसी मंत्रालय की जिम्मेदारी है।
संसदीय समिति, जिसकी अध्यक्षता भाजपा सांसद बैजयंत पांडा कर रहे हैं, ने सुझाव दिया है कि 100% सहमति के बजाय 'क्वालिफाइड सुपरमेजॉरिटी' दृष्टिकोण अपनाया जाए। इसके तहत यदि 70% से 75% प्रभावित ग्राम सभाएं सहमति दे देती हैं, तो परियोजना को मंजूरी दी जा सकती है। उदाहरण के लिए, तीस्ता-IV HEP परियोजना में सात ग्राम पंचायतों ने सहमति दे दी है, लेकिन केवल तीन पंचायतों की मंजूरी न मिलने के कारण पूरी परियोजना अधर में लटकी है।
"वन अधिकारों की मान्यता और विकास की आवश्यकता के बीच संतुलन बनाना अनिवार्य है, अन्यथा कानूनी विवाद परियोजनाओं की लागत और समय दोनों को बढ़ा देंगे।"
NHPC अधिकारियों ने अंतरराष्ट्रीय उदाहरण देते हुए ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड का हवाला दिया है, जहां पूर्ण सहमति के बजाय बहुमत के आधार पर निर्णय लिए जाते हैं। उनका तर्क है कि यदि दो-तिहाई बहुमत मिल जाता है, तो यह आगे बढ़ने की तत्परता को दर्शाता है और शेष NOC बाद में प्राप्त की जा सकती हैं।
| मानदंड | वर्तमान स्थिति (100% सहमति) | प्रस्तावित स्थिति (सुपरमेजॉरिटी) |
|---|---|---|
| मंजूरी का समय | औसतन 106 महीने (अत्यधिक विलंब) | संभावित रूप से काफी कम |
| निर्णय प्रक्रिया | एक भी ग्राम सभा रोक सकती है | 70-75% सहमति पर्याप्त होगी |
| परियोजना प्रभाव | तीस्ता-IV जैसी परियोजनाएं रुकी हुई हैं | राष्ट्रीय महत्व की परियोजनाएं गति पकड़ेंगी |
Frequently Asked Questions
1. क्या FRA 2006 में ग्राम सभा की सहमति का जिक्र है?
कानून में विशेष रूप से वन मंजूरी के लिए सहमति का शब्द नहीं है, लेकिन सरकारी दिशा-निर्देशों के अनुसार, वन भूमि के डायवर्जन से पहले FRA प्रक्रियाओं का पूरा होना और NOC लेना आवश्यक है।
2. 'क्वालिफाइड सुपरमेजॉरिटी' क्या है?
यह एक प्रस्तावित मॉडल है जिसमें 100% के बजाय 70% से 75% ग्राम सभाओं की सहमति मिलने पर परियोजना को मंजूरी देने का सुझाव दिया गया है।