अमेरिकी रक्षा और खुफिया अधिकारी मध्य पूर्व में तैनात कर्मियों और सुविधाओं की संख्या कम करने पर गुप्त चर्चा कर रहे हैं। यह कदम ईरान के साथ संघर्ष के बाद एक नई रणनीति और बुनियादी ढांचे की कमजोरियों को दूर करने के लिए उठाया जा रहा है।
- अमेरिकी अधिकारी मध्य पूर्व में सैन्य और खुफिया उपस्थिति में कटौती पर चर्चा कर रहे हैं।
- ईरानी हमलों ने अमेरिकी ठिकानों की गंभीर सुरक्षा खामियों को उजागर किया है।
- ड्रोन और मिसाइल हमलों से बचने के लिए सैन्य ठिकानों को जमीन के नीचे ले जाने पर विचार।
- यह कदम 9/11 के बाद अपनाई गई विस्तारवादी सैन्य नीति से एक बड़ा बदलाव हो सकता है।
अमेरिकी सैन्य और खुफिया समुदाय के भीतर उच्च स्तर पर गुप्त चर्चाएं चल रही हैं कि मध्य पूर्व में तैनात सैनिकों और सुविधाओं की संख्या को कैसे कम किया जाए। छह सूत्रों के अनुसार, ये चर्चाएं इस संभावना पर आधारित हैं कि यदि ट्रंप प्रशासन ईरान के साथ चल रहे संघर्ष को समाप्त करने में सफल रहता है, तो वहां अमेरिकी उपस्थिति को घटाया जा सकता है।
यदि ये कटौती होती है, तो यह अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में एक ऐतिहासिक बदलाव होगा। 11 सितंबर, 2001 के हमलों के बाद, अमेरिका ने इराक, अफगानिस्तान, सीरिया, यमन और लीबिया जैसे देशों में अपने सैन्य ठिकानों का तेजी से विस्तार किया था। हालांकि, ईरान के साथ हालिया संघर्ष ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ये ठिकाने अब आसान लक्ष्य बन चुके हैं, जिससे अमेरिकी बुनियादी ढांचे की कमजोरियां सामने आई हैं।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि अमेरिका वर्तमान में एक 'रणनीतिक दुविधा' का सामना कर रहा है। हालांकि वहां अभी भी 50,000 सैनिक और दो विमान वाहक पोत तैनात हैं, लेकिन इन असुरक्षित ठिकानों को बनाए रखने की मानवीय और भौतिक कीमत बढ़ती जा रही है। हालिया संघर्ष में 18 अमेरिकी सैनिकों की मौत ने इस बात पर जोर दिया है कि दो दशक पुरानी रणनीति को बदलने का समय आ गया है।
जोखिमों को कम करने के लिए, पेंटागन अब बचे हुए बुनियादी ढांचे को "मजबूत" (harden) करने का मूल्यांकन कर रहा है। इसमें प्रमुख सैन्य प्रतिष्ठानों को जमीन के नीचे ले जाने का प्रस्ताव शामिल है। हालांकि भूमिगत ठिकानों का विचार वर्षों से चर्चा में था, लेकिन ईरानी ड्रोन युद्ध की प्रभावशीलता ने इसे एक रणनीतिक आवश्यकता बना दिया है।
कमियां हमेशा से ज्ञात थीं, लेकिन अमेरिका ने कभी इस पर तत्परता से काम नहीं किया।
ऐतिहासिक रूप से, अमेरिका इस क्षेत्र से पूरी तरह बाहर निकलने में विफल रहा है। 2011 में, राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अफगानिस्तान से सैनिकों की वापसी की घोषणा की थी और इराक से सेना हटा ली थी, लेकिन ISIS के उदय ने एक ऐसा शून्य पैदा किया कि अमेरिका को वापस लौटना पड़ा। यह चक्र दर्शाता है कि किसी भी वापसी की योजना को क्षेत्रीय अस्थिरता के जोखिम के साथ तौलना होगा।
| अवधि | अनुमानित सैनिकों की संख्या | मुख्य रणनीतिक फोकस |
|---|---|---|
| 9/11 से पहले (1998) | 27,000 | क्षेत्रीय नियंत्रण |
| इराक आक्रमण (2003) | 250,000 | शासन परिवर्तन / आतंकवाद विरोधी युद्ध |
| 2011 के बाद का दौर | 30,000 - 60,000 | आतंकवाद विरोधी / ईरान का मुकाबला |
| वर्तमान स्थिति | 50,000 | संघर्ष प्रबंधन / ठिकानों की सुरक्षा |
इन आंतरिक चर्चाओं के बावजूद, जमीनी हकीकत अब भी तनावपूर्ण है। ईरान लगातार जॉर्डन और संयुक्त अरब अमीरात में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बना रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, रियाद, सऊदी अरब में CIA का एक आउटपोस्ट ईरानी हमले में पूरी तरह नष्ट हो गया, जो वर्तमान अमेरिकी स्थिति की नाजुकता को दर्शाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न: अमेरिका सैन्य ठिकानों को जमीन के नीचे ले जाने पर विचार क्यों कर रहा है?
उत्तर: ईरानी लंबी दूरी की मिसाइलों और आत्मघाती ड्रोन के बढ़ते खतरे से बचने के लिए, क्योंकि सतह पर स्थित ठिकाने अब असुरक्षित हो चुके हैं।
प्रश्न: क्या अमेरिका मध्य पूर्व को पूरी तरह छोड़ देगा?
उत्तर: वर्तमान चर्चाएं पूरी तरह हटने के बजाय "कम उपस्थिति" पर केंद्रित हैं, ताकि विमानों और खुफिया जानकारी के लिए रणनीतिक स्थान सक्रिय रहें।