हिमाचल प्रदेश ने देश के पहले परमवीर चक्र विजेता मेजर सोमनाथ शर्मा को उनकी पुण्यतिथि पर याद किया। 1947 के ऐतिहासिक बड़गाम युद्ध में उनके अदम्य साहस ने श्रीनगर हवाई अड्डे को पाकिस्तानी घुसपैठियों से बचाया था।

  • मेजर सोमनाथ शर्मा भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान 'परमवीर चक्र' के पहले प्राप्तकर्ता थे।
  • उन्होंने 3 नवंबर 1947 को बड़गाम की लड़ाई में श्रीनगर हवाई अड्डे की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया था।
  • हिमाचल प्रदेश और पूरा देश उनके अदम्य साहस और नेतृत्व क्षमता को आज भी नमन करता है।

देवभूमि और वीरों की भूमि के रूप में प्रसिद्ध हिमाचल प्रदेश ने हाल ही में देश के पहले परमवीर चक्र (PVC) विजेता मेजर सोमनाथ शर्मा को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। भारत के इस महान सपूत का बलिदान आज भी देश की सेना और नागरिकों के लिए राष्ट्रभक्ति का सबसे बड़ा प्रतीक बना हुआ है।

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में जन्मे मेजर सोमनाथ शर्मा एक ऐसे परिवार से ताल्लुक रखते थे जिसका सैन्य इतिहास बेहद गौरवशाली रहा है। 3 नवंबर 1947 को बड़गाम की जंग में उनके अदम्य साहस की परीक्षा हुई, जहां उनकी टुकड़ी ने पाकिस्तानी कबाइलियों के भारी हमले का सामना किया और श्रीनगर को बचाने में अहम भूमिका निभाई।

हॉकी खेलते समय हाथ में लगी चोट के कारण मेजर शर्मा का एक हाथ प्लास्टर में था, लेकिन उन्होंने अपनी कंपनी (डी कंपनी, 4 कुमाऊं रेजिमेंट) का नेतृत्व करने की जिद की। वे जानते थे कि यदि श्रीनगर हवाई अड्डा दुश्मनों के कब्जे में चला गया, तो भारत कश्मीर में अपनी सेना नहीं भेज पाएगा और इतिहास हमेशा के लिए बदल जाएगा।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि बड़गाम की लड़ाई स्वतंत्र भारत के इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ थी। मेजर शर्मा द्वारा दुश्मनों को रोके रखने के कारण ही भारतीय वायुसेना को श्रीनगर में सेना उतारने का समय मिला, जिससे कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा बना रहा।

दुश्मन की भारी गोलाबारी के बीच मेजर सोमनाथ शर्मा अपनी जान की परवाह किए बिना अपने जवानों को गोला-बारूद बांटते रहे। ब्रिगेड मुख्यालय को भेजा गया उनका आखिरी संदेश आज भी भारतीय सेना के इतिहास में अमर है: "दुश्मन हमसे केवल 50 गज की दूरी पर है। हमारी संख्या बहुत कम है। हम भीषण गोलाबारी का सामना कर रहे हैं। मैं एक इंच भी पीछे नहीं हटूंगा और अपने आखिरी जवान और आखिरी गोली तक लड़ूंगा।"

मेजर सोमनाथ शर्मा की रणनीतिक सूझबूझ और विपरीत परिस्थितियों में भी पीछे न हटने के फैसले ने राष्ट्र निर्माण के एक बेहद नाजुक मोड़ पर भारतीय सैन्य वीरता को एक नई परिभाषा दी।

इस संदेश को भेजने के कुछ ही देर बाद एक मोर्टार शेल उनके पास आकर फटा, जिससे वे वीरगति को प्राप्त हो गए। हालांकि, उनके इस सर्वोच्च बलिदान ने भारतीय सेना को आवश्यक समय दे दिया और श्रीनगर हवाई अड्डे को सुरक्षित बचा लिया गया। उन्हें मरणोपरांत भारत के पहले 'परमवीर चक्र' से सम्मानित किया गया।

पैरामीटरभारतीय सेना (डी कंपनी, 4 कुमाऊं)पाकिस्तानी घुसपैठिए (लश्कर)
सैनिकों की संख्यालगभग 150 सैनिकलगभग 500 से 700 कबाईली
मुख्य उद्देश्यश्रीनगर हवाई अड्डे की हर हाल में रक्षाहवाई अड्डे पर कब्जा कर श्रीनगर को हड़पना
परिणामदुश्मनों को रोकने में सफल; हवाई अड्डा सुरक्षितहवाई अड्डे पर कब्जा करने में विफल; पीछे हटना पड़ा
क्या आप जानते हैं?: मेजर सोमनाथ शर्मा के परिवार में सैन्य सेवा की गहरी परंपरा थी; उनके पिता मेजर जनरल अमर नाथ शर्मा सेना में डॉक्टर थे, जबकि उनके भाई जनरल वी.एन. शर्मा आगे चलकर भारतीय थल सेना के प्रमुख (चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ) बने।

Frequently Asked Questions

1. मेजर सोमनाथ शर्मा क्यों प्रसिद्ध हैं?
वे भारत के पहले परमवीर चक्र विजेता हैं। उन्होंने 1947 के युद्ध में श्रीनगर हवाई अड्डे को दुश्मनों से बचाते हुए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था।

2. बड़गाम की लड़ाई कब हुई थी?
बड़गाम की ऐतिहासिक लड़ाई 3 नवंबर 1947 को जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर के पास हुई थी।