मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जु ने भारत के साथ संबंधों में सुधार के संकेतों के बीच एक महत्वपूर्ण पोर्ट प्रोजेक्ट चीन को सौंपकर नई रणनीतिक बहस छेड़ दी है। यह कदम हिंद महासागर में भारत की स्थिति के लिए एक बड़ी चुनौती माना जा रहा है।
- मालदीव ने थिलाफुशी पोर्ट के विकास का पहला चरण चीन की हार्बर इंजीनियरिंग कंपनी को सौंपा।
- भारत थिलाफुशी को जोड़ने के लिए 500 मिलियन डॉलर की कनेक्टिविटी परियोजना का निर्माण कर रहा है।
- राष्ट्रपति मुइज्जु की 'इंडिया आउट' नीति और हालिया वित्तीय मदद के बीच विरोधाभासी रुख।
मालदीव की राजनीति में एक बार फिर नाटकीय मोड़ आया है। राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जु, जिन्होंने अपने कार्यकाल की शुरुआत 'इंडिया आउट' अभियान से की थी, हाल ही में भारत के साथ मित्रता का हाथ बढ़ा रहे थे। उन्होंने भारत द्वारा निर्मित थिलामाले ब्रिज की सराहना की और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का आभार व्यक्त किया। लेकिन इस मधुरता के पीछे एक बड़ा रणनीतिक झटका छिपा था, जब यह खबर आई कि मालदीव ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण थिलाफुशी पोर्ट परियोजना को एक चीनी कंपनी को सौंप दिया है।
मालदीव पोर्ट्स लिमिटेड ने थिलाफुशी पोर्ट के विकास के पहले चरण का काम चीन की हार्बर इंजीनियरिंग कंपनी को दिया है। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य माले पोर्ट पर बढ़ते दबाव को कम करना और देश की व्यापारिक गतिविधियों को थिलाफुशी की ओर स्थानांतरित करना है। आने वाले समय में थिलाफुशी मालदीव के सबसे प्रमुख व्यापारिक केंद्रों में से एक बनने जा रहा है।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows that this move creates a paradoxical situation where India is building the 'road' (connectivity) while China is building the 'destination' (the port). Under the Greater Male Connectivity Project, India is investing 400 million dollars in loans and 100 million dollars in grants to build bridges and roads connecting Male, Vilimalé, Gulhifalhū, and Thilafushi. Essentially, Indian infrastructure will facilitate access to a port managed by Chinese interests, potentially giving Beijing a strategic foothold in the Indian Ocean.
मालदीव का यह कदम दर्शाता है कि वह आर्थिक संकट से उबरने के लिए भारत की मदद और बुनियादी ढांचे के लिए चीन के निवेश के बीच एक खतरनाक संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है।
ऐतिहासिक रूप से, मुइज्जु ने सत्ता में आते ही चीनी प्रभाव को बढ़ाया और भारतीय सैन्य कर्मियों की वापसी की मांग की। हालांकि, गंभीर आर्थिक संकट और भारी कर्ज ने उन्हें वापस भारत की ओर मोड़ा। भारत ने 400 मिलियन डॉलर के करेंसी स्वैप और लगभग 3,000 करोड़ रुपये की सहायता प्रदान की, जिससे मुइज्जु के व्यवहार में बदलाव आया। लेकिन थिलाफुशी पोर्ट का सौदा यह स्पष्ट करता है कि मालदीव पूरी तरह से किसी एक पक्ष की ओर नहीं झुका है।
भारत के लिए यह स्थिति तीन स्तरों पर नुकसानदेह हो सकती है। पहला, रणनीतिक प्रभाव का कम होना क्योंकि भारत द्वारा निर्मित कनेक्टिविटी अंततः चीनी पोर्ट को लाभ पहुँचाएगी। दूसरा, हिंद महासागर में बीजिंग का बढ़ता प्रभाव, जो भारत की सुरक्षा चिंताओं के लिए संवेदनशील है। तीसरा, 2024 में भारत और मालदीव के बीच थिलाफुशी पोर्ट पर मिलकर काम करने के समझौते को दरकिनार करना।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: थिलाफुशी पोर्ट परियोजना का महत्व क्या है?
यह पोर्ट मालदीव के मुख्य व्यापारिक केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है ताकि राजधानी माले के बंदरगाहों पर भीड़ कम की जा सके।
प्रश्न 2: भारत इस परियोजना में कैसे शामिल था?
भारत 'ग्रेटर माले कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट' के माध्यम से इस क्षेत्र को जोड़ने वाले पुलों और सड़कों का निर्माण कर रहा है।