गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी के एक छात्र को शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए 5 लाख रुपये का बॉन्ड भरने का नोटिस दिया गया था। हालांकि पुलिस ने इसे बाद में 'गलत' बताकर रद्द कर दिया, लेकिन छात्र ने जवाबदेही तय करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

  • गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी के छात्र अक्षत त्रिपाठी को BNSS की धाराओं के तहत नोटिस जारी किया गया था।
  • पुलिस ने नोटिस को 'त्रुटिपूर्ण' (flawed) मानते हुए रद्द किया और संबंधित अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई शुरू की।
  • छात्र ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर नोटिस जारी करने के आधार और कारणों की मांग की है।

नोएडा स्थित गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी के द्वितीय वर्ष के बीए एलएलबी छात्र अक्षत त्रिपाठी ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। त्रिपाठी, जो इलाहाबाद के निवासी हैं और यूनिवर्सिटी में एसएफआई (SFI) इकाई के सचिव हैं, को हाल ही में एक मजिस्ट्रेट द्वारा शांति बनाए रखने के लिए 5 लाख रुपये का व्यक्तिगत बॉन्ड भरने का नोटिस भेजा गया था।

यह मामला जुलाई में जंतर-मंतर पर हुए एक विरोध प्रदर्शन से जुड़ा है। पुलिस रिपोर्ट में आरोप लगाया गया था कि त्रिपाठी छात्रों के बीच 'सरकार विरोधी और भ्रामक बयान' फैला रहे थे, जिससे सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका थी। हालांकि, त्रिपाठी ने इन आरोपों को पूरी तरह निराधार बताया है। उनका दावा है कि वह 25 मई से यूनिवर्सिटी नहीं गए थे और जुलाई के दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट में इंटर्नशिप कर रहे थे।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह घटना निवारक कानूनी प्रावधानों (Preventive Legal Provisions) के संभावित दुरुपयोग को उजागर करती है। जब प्रशासन बिना ठोस सबूतों के केवल 'संदेह' के आधार पर नोटिस जारी करता है, तो यह न केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन है, बल्कि सरकारी मशीनरी की अक्षमता को भी दर्शाता है।

निवारक हिरासत और नोटिस का उपयोग शांति बनाए रखने के लिए होना चाहिए, न कि लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शनों को दबाने के लिए।

अक्षत त्रिपाठी ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की। उन्होंने तर्क दिया कि उन्हें यह नहीं बताया गया कि उनके खिलाफ क्या सबूत हैं, जो कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है। उन्होंने सवाल उठाया कि विरोध प्रदर्शन के दो महीने बाद अचानक किसी अधिकारी के मन में यह विचार कैसे आया कि वह शांति भंग कर सकते हैं।

नोएडा पुलिस ने एक आधिकारिक बयान में स्वीकार किया कि नोटिस भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126 और 135 के तहत जारी किया गया था। पुलिस ने कहा कि वरिष्ठ अधिकारियों के संज्ञान में आने के बाद, 5 सितंबर को इस 'त्रुटिपूर्ण' नोटिस को रद्द कर दिया गया और जिम्मेदार कर्मियों के खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू कर दी गई है।

क्या आप जानते हैं?: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) ने पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की जगह ली है, जिसमें शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए मजिस्ट्रेट को निवारक शक्तियां दी गई हैं।

Frequently Asked Questions

1. अक्षत त्रिपाठी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा क्यों खटखटाया?
भले ही नोटिस रद्द कर दिया गया हो, लेकिन त्रिपाठी यह जानना चाहते हैं कि बिना किसी आपराधिक इतिहास और बिना यूनिवर्सिटी में मौजूद रहे, उन्हें नोटिस जारी करने का आधार क्या था।

2. BNSS की धारा 126 और 135 क्या हैं?
ये निवारक कानूनी प्रावधान हैं जिनका उपयोग कार्यकारी मजिस्ट्रेट सार्वजनिक शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए व्यक्तियों से बॉन्ड भरवाने के लिए करते हैं।