मद्रास उच्च न्यायालय ने मजिस्ट्रेटों द्वारा एडवोकेट कमिश्नरों के लिए एक समान फीस तय करने की प्रथा को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि फीस संपत्ति के मूल्य और कार्य की जटिलता के आधार पर तय होनी चाहिए।

  • मद्रास हाईकोर्ट ने ₹80,000 की एक समान फीस (Uniform Fee) को मनमाना करार दिया।
  • कोर्ट ने 'आनुपातिकता के सिद्धांत' (Doctrine of Proportionality) को लागू करने का निर्देश दिया।
  • फीस तय करते समय संपत्ति का मूल्य, स्थान और कार्य की मात्रा पर विचार करना अनिवार्य है।

मद्रास उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में यह व्यवस्था दी है कि SARFAESI अधिनियम, 2002 के तहत अचल संपत्तियों का कब्जा लेने के लिए नियुक्त एडवोकेट कमिश्नरों की फीस काम की प्रकृति के अनुपात में होनी चाहिए। मुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्मधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन की पीठ ने चेंगलपट्टु के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) द्वारा सभी मामलों में ₹80,000 की एक समान फीस तय करने की प्रथा पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की।

अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायिक मजिस्ट्रेटों द्वारा निर्धारित शुल्क केवल एक निश्चित आंकड़ा नहीं हो सकता, बल्कि इसे बकाया राशि, सुरक्षित संपत्ति के मूल्य, संपत्ति के स्थान, वारंट में शामिल संपत्तियों की संख्या और यात्रा की दूरी जैसे कारकों पर आधारित होना चाहिए।

यह क्यों महत्वपूर्ण है?

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह फैसला कानूनी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। जब एक छोटे ऋण और करोड़ों के ऋण वाले मामले में एक ही शुल्क लिया जाता है, तो यह मुकदमेबाज (litigant) पर अनुचित वित्तीय बोझ डालता है। यह निर्णय यह सुनिश्चित करता है कि न्यायिक विवेक का उपयोग तर्कसंगत तरीके से किया जाए, न कि केवल प्रशासनिक सुविधा के लिए।

"न्यायिक आदेश जो मुकदमेबाज की जेब से भुगतान किए जाने वाले पारिश्रमिक को तय करते हैं, उनका उस कार्य से तर्कसंगत संबंध होना चाहिए जिसके लिए मुआवजा दिया जा रहा है।"

मामले की सुनवाई के दौरान, CJM ने तर्क दिया कि उनके पूर्ववर्ती मजिस्ट्रेट ₹25,000 की फीस तय करते थे, लेकिन बार सदस्यों के अनुरोध और आर्थिक परिस्थितियों के कारण इसे बढ़ाकर ₹80,000 कर दिया गया ताकि असमानता की शिकायतों से बचा जा सके। हालांकि, उच्च न्यायालय ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।

न्यायाधीशों ने कहा कि कुछ लाख के दावे और करोड़ों के दावे को एक समान मानना तर्कहीन है। कोर्ट ने उन आदेशों को रद्द कर दिया और मामले को वापस CJM के पास भेज दिया ताकि वे काम के अनुपात में नई फीस तय करें। साथ ही, कोर्ट ने बैंकों द्वारा SARFAESI अधिनियम के तहत दायर आवेदनों के त्वरित निपटान की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

क्या आप जानते हैं?: SARFAESI अधिनियम बैंकों को अदालत के हस्तक्षेप के बिना सुरक्षित संपत्तियों को जब्त करने और बेचने का अधिकार देता है, बशर्ते ऋण को 'गैर-निष्पादित संपत्ति' (NPA) घोषित कर दिया गया हो।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: कोर्ट ने एक समान फीस को गलत क्यों माना?
उत्तर: क्योंकि यह 'आनुपातिकता के सिद्धांत' का उल्लंघन था और विभिन्न मूल्यों वाली संपत्तियों के लिए एक ही शुल्क लेना मनमाना था।

प्रश्न 2: अब फीस कैसे तय की जाएगी?
उत्तर: अब फीस संपत्ति के मूल्य, दूरी, कार्य की जटिलता और संपत्तियों की संख्या के आधार पर तय की जाएगी।