पूर्व नौकरशाह अमिताभ कांत ने वैश्विक संघर्षों के बीच ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की चुनौतियों पर चर्चा की। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत को चीन और अमेरिका के बीच संतुलन बनाते हुए ग्लोबल साउथ का नेतृत्व करना होगा।

  • ब्रिक्स का विस्तार भू-राजनीतिक तनावों के बीच एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है।
  • भारत इसे 'पश्चिमी-विरोधी' के बजाय एक 'गैर-पश्चिमी' विकास मंच के रूप में देखता है।
  • ऊर्जा सुरक्षा के लिए एलपीजी और एलएनजी आयात का विविधीकरण भारत की प्राथमिकता है।

हाल ही में आयोजित एक उच्च-स्तरीय पैनल चर्चा में, पूर्व सीईओ और वरिष्ठ रणनीतिकार अमिताभ कांत ने स्पष्ट किया कि वर्तमान ब्रिक्स शिखर सम्मेलन एक ऐसे समय में हो रहा है जब दुनिया गंभीर भू-राजनीतिक उथल-पुथल से गुजर रही है। पश्चिम एशिया और पूर्वी यूरोप में जारी संघर्षों ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं और कूटनीतिक संबंधों को अस्थिर कर दिया है, जिससे ब्रिक्स जैसे समूहों की भूमिका और अधिक जटिल हो गई है।

विशेषज्ञों ने इस बात पर गहराई से विश्लेषण किया कि ब्रिक्स अब केवल पांच देशों का समूह नहीं रहा, बल्कि इसका विस्तार इसे एक शक्तिशाली आर्थिक ब्लॉक बनाता है। हालांकि, मुख्य चुनौती यह है कि इसे एक 'पश्चिमी-विरोधी' (Anti-Western) गुट के रूप में नहीं, बल्कि एक 'गैर-पश्चिमी' (Non-Western) विकास मंच के रूप में स्थापित किया जाए। भारत की विदेश नीति इसी संतुलन पर टिकी है कि वह एक तरफ चीन के साथ सदस्य देश के रूप में जुड़ा है और दूसरी तरफ अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी बनाए हुए है।

Why This Matters

BozokMedia analysis shows that India's leadership within BRICS is crucial for the Global South. By pushing for a formal BRICS secretariat in New Delhi, India aims to institutionalize its influence and ensure that the group's agenda remains focused on sustainable development and equitable trade rather than purely geopolitical rivalry.

"The success of the expanded BRICS depends on its ability to bridge the gap between diverse political ideologies while focusing on collective economic growth."

चर्चा के दौरान वैश्विक व्यापार और मुद्रा प्रणालियों पर भी विस्तार से बात हुई। विशेषज्ञों ने स्वीकार किया कि हालांकि स्थानीय मुद्राओं में व्यापार (Local Currency Trade) को बढ़ावा दिया जा रहा है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय वित्त में अमेरिकी डॉलर का प्रभुत्व अभी भी बरकरार है। टैरिफ नीतियों और आपूर्ति श्रृंखलाओं के पुनर्गठन ने सदस्य देशों को अपनी आर्थिक निर्भरता को फिर से सोचने पर मजबूर किया है।

ऊर्जा सुरक्षा के संदर्भ में, भारत ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है। क्षेत्रीय शत्रुताओं के प्रभाव को कम करने के लिए, भारत अब LPG और LNG के आयात के लिए नए और विविध स्रोतों की तलाश कर रहा है ताकि किसी एक देश पर निर्भरता कम की जा सके। इसके अलावा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) गवर्नेंस और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों के साथ कूटनीतिक संबंधों पर भी चर्चा की गई।

क्या आप जानते हैं?: ब्रिक्स (BRICS) का मूल उद्देश्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं को एक मंच प्रदान करना था, लेकिन अब यह वैश्विक शासन (Global Governance) में सुधार की मांग करने वाला एक प्रमुख समूह बन गया है।

Frequently Asked Questions

1. क्या ब्रिक्स एक पश्चिमी-विरोधी समूह है?
नहीं, विशेषज्ञों के अनुसार, भारत इसे एक गैर-पश्चिमी विकास मंच के रूप में देखता है जो समावेशी विकास को बढ़ावा देता है।

2. ब्रिक्स सचिवालय के लिए नई दिल्ली का प्रस्ताव क्यों दिया गया है?
ताकि समूह के कार्यों को अधिक व्यवस्थित किया जा सके और भारत की रणनीतिक स्थिति का लाभ उठाकर ग्लोबल साउथ का बेहतर प्रतिनिधित्व हो सके।