कश्मीर के लोग बादल फटने और अनियमित मौसम की घटनाओं को महसूस तो कर रहे हैं, लेकिन वे इसके पीछे के वैज्ञानिक कारणों से अनजान हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अब विकास योजनाओं में जलवायु जोखिमों को शामिल करना अनिवार्य है।
- कश्मीर में चरम मौसम की घटनाएं बढ़ी हैं, एक ही सीजन में 100 से अधिक ओलावृष्टि दर्ज की गई।
- IUST के अध्ययन के अनुसार, 95% लोग बारिश के पैटर्न में बदलाव महसूस करते हैं, लेकिन वैज्ञानिक समझ की कमी है।
- तापमान में अस्थिरता और बुनियादी ढांचे की विफलता के कारण कृषि और बागवानी पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।
- विशेषज्ञों ने नेपाल जैसी आपदाओं से बचने के लिए जलवायु जोखिम को विकास योजनाओं का हिस्सा बनाने की अपील की है।
कश्मीर के शांत परिदृश्य अब जलवायु परिवर्तन की अराजकता का केंद्र बनते जा रहे हैं। 1 सितंबर को पहलगाम में बादल फटने के बाद भीषण फ्लैश फ्लड (अचानक बाढ़) आई, जिसने सड़कों और होटलों को तहस-नहस कर दिया। यह इस सीजन की दूसरी ऐसी घटना थी। अब ओलावृष्टि, बादल फटना, भीषण गर्मी और अनियमित बारिश जैसी घटनाएं आम हो गई हैं, जो न केवल जीवन बल्कि आजीविका के लिए भी खतरा बन गई हैं।
चिंताजनक बात यह है कि स्थानीय लोग इन बदलावों को कैसे देखते हैं। हालांकि जलवायु परिवर्तन के भौतिक प्रमाण स्पष्ट हैं, लेकिन उनकी व्याख्या अलग है। कई निवासी इन आपदाओं को नैतिक पतन के लिए 'दैवीय दंड' मानते हैं, जबकि केवल एक छोटा वर्ग इसे ग्लोबल वार्मिंग और हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की संवेदनशीलता से जोड़कर देखता है। अनुभव और विज्ञान के बीच का यह अंतर आपदा प्रबंधन में एक बड़ी बाधा है।
इस्लामिक यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (IUST) द्वारा किए गए एक शोध ने इस विरोधाभास को उजागर किया है। 800 लोगों पर किए गए सर्वेक्षण में पाया गया कि लोगों में "अनुभवात्मक जागरूकता" (experiential awareness) बहुत अधिक है। उदाहरण के लिए, 95% उत्तरदाताओं ने अनियमित बारिश और 89% ने बर्फबारी में कमी को महसूस किया। लेकिन यह जागरूकता वैज्ञानिक समझ में नहीं बदलती; लोग गर्मी और बारिश को महसूस तो करते हैं, लेकिन उसके पीछे के वायुमंडलीय कारणों को नहीं समझते।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि कश्मीर जैसे उच्च-जोखिम वाले क्षेत्रों में जलवायु साक्षरता की कमी प्रबंधनीय जोखिमों को अपरिहार्य आपदाओं में बदल देती है। जब कोई आबादी बादल फटने को मौसम विज्ञान के बजाय एक आध्यात्मिक घटना मानती है, तो वैज्ञानिक शमन और लचीले बुनियादी ढांचे की तात्कालिकता कम हो जाती है। नेपाल और तिब्बत में हाल ही में आई हिमनद झील विस्फोट (GLOF) की बाढ़ कश्मीर के लिए एक गंभीर चेतावनी है।
"जलवायु साक्षरता को केवल पर्यावरण शिक्षा के रूप में नहीं, बल्कि आपदा जोखिम न्यूनीकरण के एक आवश्यक घटक के रूप में देखा जाना चाहिए।" - प्रो. शकील अहमद रोमशू, कुलपति IUST।
इसका आर्थिक प्रभाव सबसे अधिक प्राथमिक क्षेत्र में दिख रहा है। SKUAST के प्रो. फारूक अहमद लोन के अनुसार, कृषि और बागवानी—जो कश्मीर की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं—सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। इसके अलावा, जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग की नाजुक स्थिति रसद (logistics) के लिए दुःस्वप्न बन गई है; भूस्खलन के कारण खराब होने वाले उत्पादों की ढुलाई रुक जाती है, जिससे किसानों को भारी वित्तीय नुकसान होता है।
हालांकि कुछ भूवैज्ञानिकों, जैसे डॉ. खुर्शीद अहमद पररे का तर्क है कि कश्मीर की चौड़ी घाटी नेपाल की संकरी घाटियों की तरह विनाशकारी हिमनद झील विस्फोटों के प्रति कम संवेदनशील है, लेकिन फ्लैश फ्लड और भूस्खलन का खतरा अभी भी गंभीर है। जल संसाधनों की कमी और ग्लेशियरों का सिकुड़ना ऐसी प्रणालीगत विफलताएं हैं जिनके लिए तत्काल नीतिगत हस्तक्षेप की आवश्यकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: कश्मीर अन्य क्षेत्रों की तुलना में जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक संवेदनशील क्यों है?
उत्तर: हिमालयी श्रृंखला का हिस्सा होने के कारण, कश्मीर एक "क्लाइमेट हॉटस्पॉट" है जहाँ तापमान वृद्धि से ग्लेशियर तेजी से पिघलते हैं, जिससे बादल फटने और भूस्खलन की घटनाएं बढ़ जाती हैं।
प्रश्न 2: जलवायु परिवर्तन स्थानीय अर्थव्यवस्था को कैसे प्रभावित करता है?
उत्तर: यह फसल के समय को बाधित करता है, सेब के बागों में कीटों के प्रभाव को बढ़ाता है और भूस्खलन के कारण परिवहन में देरी करता है, जिससे किसानों को आर्थिक हानि होती है।