केंद्र सरकार ने लद्दाख को राज्य का दर्जा देने से इनकार कर दिया है और इसके बजाय एक 'सुई जेनेरिस' (Sui Generis) संवैधानिक मॉडल का प्रस्ताव दिया है। स्थानीय नेताओं ने इस बैठक को समय और पैसे की बर्बादी बताया है।

  • लद्दाख को न तो पूर्ण राज्य का दर्जा मिलेगा और न ही विधायिका वाला केंद्र शासित प्रदेश।
  • अनुच्छेद 371 के तहत एक 'सुई जेनेरिस' (अनोखा) मॉडल प्रस्तावित है, जिसमें विधायी, कार्यकारी और वित्तीय शक्तियां होंगी।
  • लेह एपेक्स बॉडी (LAB) और कारगिल डेमोक्रेटिक एलायंस (KDA) ने वार्ता पर निराशा जताई है।
  • सोनम वांगचुक ने चेतावनी दी है कि ठोस आश्वासन न मिलने पर विरोध प्रदर्शन फिर शुरू होंगे।

केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख के प्रशासनिक भविष्य को लेकर एक महत्वपूर्ण अपडेट आया है। मुख्य सचिव आशीष कुंडरा ने स्पष्ट किया है कि केंद्र सरकार लद्दाख को राज्य का दर्जा या विधायिका वाला केंद्र शासित प्रदेश (UT) नहीं दे रही है। इसके बजाय, लद्दाख के लिए एक 'सुई जेनेरिस' (Sui Generis) मॉडल तैयार किया जाएगा—एक ऐसा अनोखा संवैधानिक ढांचा जो देश में कहीं और मौजूद नहीं है।

मुख्य सचिव ने बताया कि इस प्रस्तावित निकाय का उद्देश्य स्थानीय लोगों की विधायी, कार्यकारी और वित्तीय शक्तियों की आकांक्षाओं को पूरा करना है। हालांकि, इस निकाय के प्रमुख को 'मुख्यमंत्री' कहा जाएगा या कोई और नाम दिया जाएगा, यह अभी तय नहीं है। सरकार का तर्क है कि यह मॉडल लद्दाख को आवश्यक स्वायत्तता प्रदान करेगा, लेकिन वह केंद्र शासित प्रदेश ही रहेगा।

9 सितंबर को लेह एपेक्स बॉडी (LAB) और कारगिल डेमोक्रेटिक एलायंस (KDA) के साथ हुई बैठक में संविधान के अनुच्छेद 371 के तहत प्रस्तावित ढांचे पर चर्चा हुई। बैठक में इस बात पर सहमति बनी कि इस निकाय के लिए "क्षेत्रों के माध्यम से प्रत्यक्ष चुनाव" होने चाहिए। हालांकि, मौजूदा हिल काउंसिलों और नए प्रस्तावित निकाय के बीच शक्तियों के बंटवारे पर अभी गहन चर्चा होनी बाकी है।

यह क्यों महत्वपूर्ण है?

BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, सरकार एक कठिन संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है: स्थानीय आक्रोश को शांत करने के लिए पर्याप्त स्वायत्तता देना, लेकिन रणनीतिक रूप से संवेदनशील सीमा क्षेत्र पर केंद्र का कड़ा नियंत्रण बनाए रखना। 'राज्य' शब्द से बचकर, केंद्र यह सुनिश्चित कर रहा है कि गृह मंत्रालय का अंतिम नियंत्रण बना रहे।

सुई जेनेरिस मॉडल की ओर झुकाव यह दर्शाता है कि केंद्र चीन और पाकिस्तान की सीमा से लगे इस क्षेत्र में पूर्ण राज्य विधानसभा का जोखिम नहीं उठाना चाहता।

लद्दाख के नेतृत्व की प्रतिक्रिया बेहद नकारात्मक रही है। जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक और LAB के अन्य सदस्यों ने इस बैठक को "समय और पैसे की बर्बादी" करार दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि गृह मंत्रालय (MHA) और एल-जी विनय सक्सेना के नेतृत्व वाला प्रशासन एक ही पृष्ठ पर नहीं हैं। वांगचुक ने कहा कि मई में हुए वादे के बावजूद सरकार कोई ठोस ड्राफ्ट पेश नहीं कर पाई है।

सांसद मोहम्मद हनीफा ने गृह मंत्रालय और यूटी प्रशासन के बीच मतभेदों की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि जहां गृह मंत्री समाधान खोजने के लिए गंभीर दिख रहे हैं, वहीं यूटी प्रशासन जमीन और प्रशासन से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले एकतरफा ले रहा है, जिससे शांति प्रक्रिया बाधित हो रही है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

लद्दाख पहले जम्मू और कश्मीर राज्य का हिस्सा था। 2019 में अनुच्छेद 370 के हटने के बाद, लद्दाख को बिना विधायिका के एक अलग केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया। शुरुआत में लेह में इसका स्वागत हुआ, लेकिन धीरे-धीरे जमीन के अधिकारों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर चिंताएं बढ़ गईं, जिसके परिणामस्वरूप LAB और KDA का गठन हुआ।

क्या आप जानते हैं?: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 371 नागालैंड और मिजोरम जैसे राज्यों के लिए विशेष प्रावधान करता है ताकि उनकी स्वदेशी संस्कृति की रक्षा हो सके; सरकार अब लद्दाख के लिए इसी ब्लूप्रिंट का उपयोग कर रही है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: 'सुई जेनेरिस' (Sui Generis) मॉडल क्या है?
यह एक लैटिन शब्द है जिसका अर्थ है 'अपनी तरह का एकमात्र'। इसका मतलब है एक ऐसा विशेष कानूनी ढांचा जो केवल लद्दाख के लिए बनाया जाएगा और सामान्य राज्य या यूटी नियमों से अलग होगा।

प्रश्न 2: लद्दाख के नेता असंतुष्ट क्यों हैं?
उनका मानना है कि सरकार राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची जैसे 'गैर-परक्राम्य' (non-negotiable) मांगों को टाल रही है और केवल प्रशासनिक बदलावों का प्रस्ताव दे रही है।