भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों के अनुसार, सितंबर की शुरुआत में भारी बारिश की कमी देखी गई है, जिससे खरीफ फसलों और खाद्य कीमतों पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। कुल मौसमी कमी अब 15% तक पहुंच गई है।
- सितंबर के पहले 9 दिनों में बारिश में 26% की भारी गिरावट दर्ज की गई।
- पूरे मानसून सीजन के दौरान कुल वर्षा में 15% की कमी आई है।
- आंध्र प्रदेश, राजस्थान और बिहार जैसे कृषि प्रधान राज्य सबसे अधिक प्रभावित हैं।
- चावल, कपास और सोयाबीन जैसी खरीफ फसलों की पैदावार पर संकट।
भारत में मानसून का संकट गहराता जा रहा है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, 1 सितंबर से 9 सितंबर के बीच देश में केवल 44.3 मिमी बारिश हुई, जबकि सामान्य तौर पर इस अवधि में 59.9 मिमी वर्षा होनी चाहिए थी। यह 26 प्रतिशत की भारी कमी है, जिसने कृषि विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं की चिंता बढ़ा दी है।
यदि व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें, तो 1 जून से 9 सितंबर तक भारत में कुल 648 मिमी वर्षा हुई है, जबकि सामान्य औसत 760.6 मिमी रहता है। इसका अर्थ है कि पूरे सीजन में अब तक 15 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। यह स्थिति उन क्षेत्रों के लिए और भी घातक है जहां लंबे समय तक सूखा रहा है और मिट्टी की नमी पूरी तरह समाप्त हो चुकी है।
क्यों है यह चिंताजनक?
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि सितंबर का महीना खरीफ फसलों के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है। इस समय चावल, कपास, सोयाबीन, मक्का और दलहन जैसी फसलें अपने विकास के महत्वपूर्ण चरण में होती हैं। यदि इस समय पर्याप्त बारिश नहीं हुई, तो न केवल पैदावार घटेगी, बल्कि बाजार में खाद्य पदार्थों की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है, जिससे आम जनता की जेब पर असर पड़ेगा।
"मानसून के अंतिम चरण में बारिश की यह कमी सीधे तौर पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य मुद्रास्फीति को प्रभावित करेगी।"
राज्यवार आंकड़ों पर नजर डालें तो वितरण बेहद असमान है। आंध्र प्रदेश सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में से एक बनकर उभरा है। इसके अलावा राजस्थान, बिहार और छत्तीसगढ़ में भी वर्षा की भारी कमी देखी गई है। दक्षिण भारत के राज्यों जैसे तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और तेलंगाना में भी सितंबर की शुरुआत निराशाजनक रही है।
सैटेलाइट तस्वीरों से पता चला है कि भारतीय उपमहाद्वीप के बड़े हिस्सों पर बादलों का घेरा काफी कम हो गया है। हालांकि बंगाल की खाड़ी में कुछ सक्रिय प्रणालियां मौजूद हैं, लेकिन पश्चिमी, मध्य और उत्तरी भारत के बड़े हिस्से बादलों से मुक्त दिख रहे हैं। मानसून के अंतिम चरण में बादलों की यह कमी इस बात का संकेत है कि अब घाटे की भरपाई के लिए समय बहुत कम बचा है।
| अवधि | सामान्य वर्षा (मिमी) | वास्तविक वर्षा (मिमी) | कमी (%) |
|---|---|---|---|
| 1-9 सितंबर | 59.9 | 44.3 | 26% |
| पूरा सीजन (जून-सितंबर) | 760.6 | 648 | 15% |
आर्थिक दृष्टि से यह स्थिति और भी गंभीर है क्योंकि देश के लगभग आधे जिलों में औसत से कम बारिश हुई है। इससे जल संसाधनों पर दबाव बढ़ेगा और सिंचाई के लिए भूजल का अत्यधिक दोहन करना पड़ेगा, जो भविष्य के लिए एक बड़ा खतरा है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. सबसे अधिक प्रभावित राज्य कौन से हैं?
आंध्र प्रदेश, राजस्थान, बिहार और छत्तीसगढ़ में सबसे अधिक वर्षा की कमी दर्ज की गई है।
2. किन फसलों पर इसका सबसे बुरा असर पड़ेगा?
मुख्य रूप से चावल, सोयाबीन, कपास और मक्का जैसी खरीफ फसलों की पैदावार कम हो सकती है।