दिल्ली हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है जिसमें सोशल मीडिया ऐप्स के 'इनफिनिट स्क्रॉल' और 'ऑटोप्ले' जैसे फीचर्स को प्रतिबंधित करने की मांग की गई है, ताकि युवाओं में बढ़ती डिजिटल लत को रोका जा सके।
- सोशल मीडिया के डिजाइन फीचर्स जैसे इनफिनिट स्क्रॉल और ऑटोप्ले को लत लगाने वाला बताया गया है।
- याचिका में 18-24 वर्ष के भारतीय युवाओं द्वारा प्रतिदिन औसतन 120 मिनट सोशल मीडिया पर बिताने का हवाला दिया गया है।
- अदालत से केंद्र सरकार और NCPCR को इन फीचर्स को विनियमित करने का निर्देश देने की मांग की गई है।
दिल्ली हाईकोर्ट में एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है, जिसमें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के उन आर्किटेक्चरल डिजाइनों की जांच के लिए एक विशेषज्ञ समिति के गठन की मांग की गई है, जो उपयोगकर्ताओं को डिजिटल लत की ओर धकेलते हैं। याचिकाकर्ता विकास कथूरिया, जो बीएमएल मुंजल यूनिवर्सिटी में कानून के प्रोफेसर हैं, का तर्क है कि समस्या केवल इस बात की नहीं है कि प्लेटफॉर्म पर क्या कंटेंट है, बल्कि यह है कि उन्हें कैसे डिजाइन किया गया है।
याचिका के अनुसार, 'इनफिनिट स्क्रॉल' (अनंत स्क्रॉलिंग), 'ऑटोप्ले', एल्गोरिदम द्वारा क्यूरेट किए गए व्यक्तिगत फीड, नोटिफिकेशन सिस्टम और 'लाइक' जैसे वेरिएबल-रिवॉर्ड मेट्रिक्स का उपयोग जानबूझकर उपयोगकर्ता का ध्यान खींचने और उन्हें प्लेटफॉर्म पर लंबे समय तक रोके रखने के लिए किया जाता है। यह डिजाइन मानव मनोविज्ञान के साथ छेड़छाड़ करता है ताकि उपयोगकर्ता बार-बार ऐप पर लौटें।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला केवल तकनीक का नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का है। जब एल्गोरिदम को केवल 'एंगेजमेंट' बढ़ाने के लिए डिजाइन किया जाता है, तो वे अक्सर उपयोगकर्ता के मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी करते हैं। भारत जैसे देश में, जहां इंटरनेट की पहुंच तेजी से बढ़ी है, इस तरह के 'डिजिटल ट्रैप्स' युवाओं के संज्ञानात्मक विकास को प्रभावित कर रहे हैं।
सोशल मीडिया का आर्किटेक्चर अब केवल सुविधा नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक हथियार बन गया है जो डोपामाइन लूप के जरिए उपयोगकर्ता को नियंत्रित करता है।
याचिका में इस बात पर जोर दिया गया है कि भारतीय संदर्भ में यह मुद्दा अत्यंत गंभीर है। आंकड़ों के अनुसार, 18-24 आयु वर्ग के भारतीय युवा प्रतिदिन औसतन 120 मिनट से अधिक समय सोशल मीडिया पर बिताते हैं। याचिका में दावा किया गया है कि नैदानिक रूप से यह साबित हो चुका है कि सोशल मीडिया पर अत्यधिक समय बिताने का सीधा संबंध किशोरों में अवसाद (डिप्रेशन) और आत्महत्या की प्रवृत्तियों से है।
इस कानूनी लड़ाई में, याचिकाकर्ता ने अदालत से अनुरोध किया है कि केंद्र सरकार और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) को निर्देश दिया जाए कि वे इन लत लगाने वाले फीचर्स को प्रतिबंधित या विनियमित करें। इस मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस तेजास कारिया ने खुद को इस मामले से अलग कर लिया, जिसके बाद अब इसे अगले सप्ताह एक अन्य बेंच द्वारा सुना जाएगा।
Frequently Asked Questions
1. इनफिनिट स्क्रॉल क्या है?
यह एक ऐसी डिजाइन विशेषता है जिसमें पेज को नीचे स्क्रॉल करते रहने पर नया कंटेंट अपने आप लोड होता रहता है, जिससे उपयोगकर्ता को रुकने का कोई संकेत नहीं मिलता।
2. याचिकाकर्ता की मुख्य मांग क्या है?
मुख्य मांग एक विशेषज्ञ समिति का गठन करना और केंद्र सरकार द्वारा लत लगाने वाले फीचर्स (जैसे ऑटोप्ले और एल्गोरिदम फीड) को विनियमित करना है।