नई दिल्ली में आयोजित होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में आतंकवाद के खिलाफ कड़े रुख, वैश्विक शासन संस्थानों में सुधार और ग्लोबल साउथ की आवाज़ को बुलंद करने वाले ऐतिहासिक घोषणापत्र पर सहमति बनने की उम्मीद है।
- आतंकवाद के सभी रूपों की स्पष्ट निंदा और वैश्विक स्तर पर इससे लड़ने की प्रतिबद्धता।
- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में भारत की स्थायी सदस्यता के लिए मजबूत समर्थन।
- ब्रिक्स को सुरक्षा गुट के बजाय एक 'विकास-उन्मुख' समूह के रूप में पुनर्गठित करना।
- 'मानवता प्रथम' के सिद्धांत के साथ जन-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाना।
नई दिल्ली आगामी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी के लिए पूरी तरह तैयार है। सूत्रों के अनुसार, 'दिल्ली घोषणापत्र' एक ऐसा दस्तावेज़ होगा जो एक बहुध्रुवीय दुनिया के लिए साझा दृष्टिकोण को रेखांकित करेगा। 12-13 सितंबर को अपनाए जाने वाले इस घोषणापत्र में 10 मुख्य बिंदु शामिल होंगे, जिनका उद्देश्य सदस्य देशों के बीच वैचारिक मतभेदों को कम करना और ग्लोबल साउथ के प्रभाव को बढ़ाना है।
एजेंडे में सबसे ऊपर आतंकवाद के खिलाफ एक दृढ़ और स्पष्ट रुख है। सदस्य देशों ने आतंकवाद के सभी रूपों की निंदा करने और उससे लड़ने के लिए एक साझा भाषा पर सहमति जताई है। इसके अलावा, शिखर सम्मेलन वैश्विक शासन संस्थानों के सुधार की वकालत करेगा, जिसमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में भारत की स्थायी सदस्यता के दावे का विशेष समर्थन शामिल है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि भारत रणनीतिक रूप से ब्रिक्स को उस 'पश्चिम-विरोधी' नैरेटिव से दूर ले जाने की कोशिश कर रहा है जिसे अक्सर रूस और चीन बढ़ावा देते हैं। 'विकास-उन्मुख परिणामों' और 'ब्रिज-बिल्डिंग' पर जोर देकर, भारत खुद को G7 देशों और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच एक अनिवार्य मध्यस्थ के रूप में स्थापित कर रहा है। यह बदलाव समूह को एक भू-राजनीतिक हथियार के बजाय एक रचनात्मक वैश्विक अभिनेता के रूप में वैध बनाने के लिए आवश्यक है।
शिखर सम्मेलन पश्चिम एशिया के संघर्षों की जटिलताओं को भी संबोधित करेगा। हालांकि ईरान और यूएई के बीच भाषा को लेकर मतभेद रहे हैं, लेकिन शेरपा एक 'सार्वभौमिक निंदा' के फॉर्मूले पर विचार कर रहे हैं, जिसमें किसी विशिष्ट देश का नाम लिए बिना क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता के उल्लंघन की निंदा की जाएगी।
ब्रिक्स का एक विशुद्ध आर्थिक मंच से संस्थागत सुधार के मंच में बदलना वैश्विक शक्ति संतुलन में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है।
दिल्ली घोषणापत्र में 'मानवता प्रथम' के विषय के तहत एक जन-केंद्रित दृष्टिकोण को भी उजागर किया जाएगा। इसमें महिलाओं, किसानों और उद्यमियों के लिए ठोस ढांचे शामिल होंगे, ताकि उच्च-स्तरीय कूटनीति का लाभ जमीनी स्तर तक पहुंचे। लचीलेपन और स्थिरता के लिए 50 से अधिक ठोस परिणामों और कार्य योजनाओं पर अंतिम मुहर लगने की उम्मीद है।
इस आयोजन में 32 देशों और एजेंसियों के नेताओं और अधिकारियों का जमावड़ा होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और विस्तारित ब्रिक्स सदस्यता व भागीदार देशों के प्रमुखों की मेजबानी करेंगे।
| विशेषता | पिछला ब्रिक्स फोकस | प्रस्तावित दिल्ली घोषणापत्र फोकस |
|---|---|---|
| मुख्य पहचान | आर्थिक सहयोग | विकास और संस्थागत सुधार |
| भू-राजनीतिक रुख | रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता/सुरक्षा | सेतु निर्माण और बहुपक्षवाद |
| प्राथमिक लक्ष्य | वैकल्पिक वित्तीय प्रणाली | ग्लोबल साउथ का प्रतिनिधित्व और UNSC सुधार |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: 'मानवता प्रथम' दृष्टिकोण का क्या महत्व है?
यह ध्यान को राज्य-स्तरीय भू-राजनीति से हटाकर नागरिकों की वास्तविक जरूरतों पर ले जाता है, विशेष रूप से सदस्य देशों के उद्यमियों, किसानों और महिलाओं को लक्षित करता है।
प्रश्न 2: शिखर सम्मेलन में कौन से प्रमुख नेता शामिल हो रहे हैं?
प्रमुख प्रतिभागियों में पीएम नरेंद्र मोदी, राष्ट्रपति शी जिनपिंग, राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और यूएई, ईरान तथा दक्षिण अफ्रीका के नेता शामिल हैं।