हरियाणा भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) ने वरिष्ठ आईएएस अधिकारी डी सुरेश और 8 अन्य के खिलाफ 3.5 करोड़ रुपये के गुरुग्राम भूमि घोटाले में मामला दर्ज किया है। यह कार्रवाई अधिकारी की सेवानिवृत्ति से ठीक पांच दिन पहले की गई है।
- IAS अधिकारी डी सुरेश और 8 अन्य पर 3.5 करोड़ रुपये के भूमि घोटाले का आरोप।
- गुरुग्राम सेक्टर 23 में 500 वर्ग गज के प्लॉट को बाजार मूल्य से बेहद कम कीमत पर ट्रांसफर किया गया।
- पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने अधिकारी को अंतरिम राहत प्रदान की है।
हरियाणा के प्रशासनिक गलियारों में उस समय हड़कंप मच गया जब भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) ने 1995 बैच के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी डी सुरेश के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज की। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह कानूनी कार्रवाई उनकी सेवानिवृत्ति से महज पांच दिन पहले की गई, जिससे इस मामले ने राजनीतिक और प्रशासनिक मोड़ ले लिया है।
यह पूरा मामला गुरुग्राम के सेक्टर 23 में स्थित एक 500 वर्ग गज के प्लॉट से जुड़ा है। आरोप है कि हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (HSVP) के इस प्लॉट की बाजार कीमत लगभग 3.5 करोड़ रुपये थी और कलेक्टर रेट 1.75 करोड़ रुपये था। इसके बावजूद, इस बेशकीमती जमीन को कथित तौर पर मात्र 6.71 लाख रुपये में ट्रांसफर कर दिया गया, जिससे सरकारी खजाने को भारी नुकसान हुआ।
घोटाले का घटनाक्रम और जालसाजी
जांच के अनुसार, यह प्लॉट मूल रूप से 1988 में आवंटित किया गया था, लेकिन भुगतान न होने के कारण इसे 'डिफ़ॉल्ट केस' घोषित कर दिया गया। साल 2002 में HSVP ने इस प्लॉट को वापस ले लिया था। हालांकि, सात साल तक चली सतर्कता जांच में यह खुलासा हुआ कि अधिकारियों और लिपिक कर्मचारियों ने एक अन्य प्लॉट से संबंधित अदालत के आदेश का सहारा लेकर फर्जी नोट शीट तैयार कीं।
FIR में आरोप लगाया गया है कि मार्च 2019 में, जब डी सुरेश HSVP के मुख्य प्रशासक के रूप में कार्यरत थे, उन्होंने इस डिफॉल्ट प्लॉट की रिकवरी प्रक्रिया को रद्द कर दिया और बहुत कम कीमत पर कन्वेयंस डीड (बिक्री विलेख) निष्पादित करने में मदद की। इस मामले में पूर्व संपदा अधिकारी मुकेश कुमार सहित कुल नौ लोगों को आरोपी बनाया गया है।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, इस मामले का समय अत्यंत महत्वपूर्ण है। एक वरिष्ठ अधिकारी के रिटायरमेंट से ठीक पहले FIR दर्ज होना अक्सर प्रशासनिक टकराव या गहरी जांच का संकेत होता है। यह मामला दर्शाता है कि कैसे उच्च पदों पर बैठे लोग कानूनी खामियों और फर्जी दस्तावेजों का उपयोग कर निजी लाभ के लिए सरकारी संपत्तियों का दुरुपयोग कर सकते हैं।
"प्रशासनिक पदों पर बैठे अधिकारियों द्वारा नियमों की अनदेखी कर सरकारी भूमि का निजी लाभ के लिए हस्तांतरण न केवल वित्तीय अपराध है, बल्कि यह सार्वजनिक विश्वास का भी उल्लंघन है।"
इस बीच, पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने डी सुरेश को अंतरिम राहत देते हुए निर्देश दिया है कि उन्हें हिरासत में लेने से पहले कम से कम सात दिनों का नोटिस दिया जाए। मामले की अगली सुनवाई 16 अक्टूबर को निर्धारित है।
| विवरण | वास्तविक मूल्य (बाजार) | कलेक्टर रेट | हस्तांतरण मूल्य (आरोपानुसार) |
|---|---|---|---|
| प्लॉट मूल्य | ₹3.5 करोड़ | ₹1.75 करोड़ | ₹6.71 लाख |
Frequently Asked Questions
1. आईएएस अधिकारी डी सुरेश पर क्या आरोप हैं?
उन पर आरोप है कि उन्होंने मुख्य प्रशासक रहते हुए एक डिफॉल्ट प्लॉट की रिकवरी रद्द की और उसे बाजार मूल्य से बहुत कम कीमत पर ट्रांसफर करवाया।
2. कोर्ट ने इस मामले में क्या आदेश दिया है?
पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने उन्हें अंतरिम राहत दी है और पुलिस को हिरासत में लेने से पहले 7 दिन का नोटिस देने का निर्देश दिया है।