CITU और कर्नाटक राज्य विद्युत कर्मचारी संघ ने राज्य सरकार पर आउटसोर्स कर्मचारियों के 'बंधुआ मजदूरी' जैसे शोषण का आरोप लगाया है। यूनियन ने स्थायी प्रकृति के कार्यों में लगे कर्मचारियों के नियमितीकरण और समान वेतन की मांग की है।

  • CITU ने बिजली क्षेत्र में आउटसोर्स और अनुबंध कर्मचारियों के नियमितीकरण के लिए कानून बनाने की मांग की है।
  • संशोधित न्यूनतम मजदूरी को लागू न करने और 'बंधुआ मजदूरी' जैसे शोषण का आरोप।
  • 29 सितंबर को बेंगलुरु में एक विशाल राज्य स्तरीय सम्मेलन का आयोजन किया जाएगा।

राज्य की श्रम प्रथाओं की कड़ी आलोचना करते हुए, CITU की राज्य महासचिव और कर्नाटक राज्य विद्युत कर्मचारी संघ की मानद अध्यक्ष एस. वरलक्ष्मी ने आरोप लगाया है कि सरकार एक 'मॉडल नियोक्ता' के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रही है। हुब्बल्ली में हेसकॉम जोनल वर्कर्स कन्वेंशन को संबोधित करते हुए, उन्होंने कहा कि उन अनुबंध और आउटसोर्स कर्मचारियों का शोषण किया जा रहा है जो स्थायी प्रकृति के पदों पर कार्यरत हैं।

यूनियन की मुख्य शिकायत 'समान कार्य के लिए समान वेतन' के सिद्धांत की अनदेखी को लेकर है। सुश्री वरलक्ष्मी के अनुसार, सरकार ने न केवल इस मौलिक श्रम अधिकार की उपेक्षा की है, बल्कि हाल ही में संशोधित न्यूनतम मजदूरी के कार्यान्वयन को भी रोक दिया है, जिसे उन्होंने कार्यबल के साथ विश्वासघात करार दिया है।

अब यह बहस इन कर्मचारियों की कानूनी स्थिति पर केंद्रित हो गई है। फेडरेशन का तर्क है कि आउटसोर्स कर्मचारी गंभीर कठिनाइयों और शोषण का सामना कर रहे हैं, और वास्तव में वे बंधुआ मजदूरी के एक आधुनिक रूप में जी रहे हैं। इसके समाधान के लिए, यूनियन ने एक विशेष कानून बनाने का आग्रह किया है जो तीसरे पक्ष की एजेंसियों के माध्यम से नियुक्त स्थायी प्रकृति के कर्मचारियों के नियमितीकरण को अनिवार्य बनाए।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि बिजली क्षेत्र जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे में आउटसोर्स श्रम पर निर्भरता एक अस्थिर कार्यबल बनाती है। जब आवश्यक सेवाएं बिना नौकरी की सुरक्षा वाले अनुबंध कर्मचारियों द्वारा संचालित की जाती हैं, तो यह न केवल औद्योगिक अशांति पैदा करता है बल्कि बिजली वितरण की गुणवत्ता और सुरक्षा को भी प्रभावित कर सकता है। यह आंदोलन भारत भर में सरकारी नौकरियों के 'अनुबंधीकरण' को चुनौती देने वाले श्रम संघों के बढ़ते रुझान का संकेत है।

सार्वजनिक उपयोगिताओं में आउटसोर्सिंग की ओर झुकाव एक वित्तीय रणनीति है जो अक्सर श्रमिक अधिकारों और दीर्घकालिक परिचालन स्थिरता के क्षरण को छिपाती है।

इन मांगों को तेज करने के लिए, कर्नाटक राज्य विद्युत कर्मचारी संघ के राज्य अध्यक्ष जे. सत्यबाबू ने 29 सितंबर को बेंगलुरु में एक राज्य स्तरीय सम्मेलन की घोषणा की है। इस सभा में बिजली उत्पादन, आपूर्ति और वितरण क्षेत्रों के कर्मचारी शामिल होंगे। EEFI के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुदीप दत्ता और CITU के राष्ट्रीय महासचिव एलामराम करीम जैसे दिग्गज नेता इस आंदोलन को राष्ट्रीय गति देने के लिए शामिल होंगे।

सम्मेलन का उद्देश्य सरकार पर तीन मुख्य मांगों के लिए दबाव बनाना है: संशोधित न्यूनतम मजदूरी का कार्यान्वयन, सेवाओं का तत्काल नियमितीकरण, और आउटसोर्स कर्मियों के शोषण का अंत।

क्या आप जानते हैं?: 'समान कार्य के लिए समान वेतन' का सिद्धांत अंतर्राष्ट्रीय श्रम मानकों का एक आधार है, जिसका उद्देश्य एक ही कार्य करने वाले स्थायी और अनुबंध कर्मचारियों के बीच वेतन भेदभाव को समाप्त करना है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: इस मामले में CITU की प्राथमिक मांग क्या है?
प्राथमिक मांग यह है कि बिजली क्षेत्र में स्थायी प्रकृति के काम करने वाले आउटसोर्स और अनुबंध कर्मचारियों को नियमित करने के लिए कानून बनाया जाए।

प्रश्न 2: राज्य स्तरीय सम्मेलन कब और कहाँ हो रहा है?
यह सम्मेलन 29 सितंबर को बेंगलुरु में आयोजित किया जाएगा, जिसमें बिजली उत्पादन, आपूर्ति और वितरण क्षेत्र के कर्मचारी भाग लेंगे।